Tuesday, June 14, 2022

वह अंधकार में हैं - अन्धं तमः प्रविशन्ति - ईशोपनिषद्

             अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
             ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः॥
                              ( ईशोपनिषद्  9)
                        अन्वय 
          ये अविद्याम् उपासते ते अन्धं तमः प्रविशन्ति। 
          ये उ विद्यायां रताः ते भूयः तमः इव प्रविशन्ति ॥
अर्थात :
जो अविद्या का - अज्ञान का अनुसरण करते हैं - गहन अंधकार में वह प्रवेश करते हैं ।
और जो केवल विद्या में ही रत रहते हैं - 
जो केवल ग्रंथों एवं शास्त्रों को पढ़ने पढ़ाने में ही अपना जीवन समर्पित कर देते हैं - 
वे उस से भी अधिक गहन अंधकार में हैं। 

अज्ञान का अनुसरण करने का अर्थ है बिना सोचे समझे - बिना अच्छी तरह जाने बूझे 
अनजाने में ही कर्मकांड का पालन करते रहना। 

ज्ञान को - सत्य को पूर्ण रुप से समझे बिना महज औपचारिक रुप से कर्मकांड - 
नियमों और संस्कारों का पालन - सत्संग एवं भक्ति इत्यादि करते रहने से ही जीवन प्रकाशमय नहीं हो जाता।  
मन में अंधकार बना ही रहता है।  

लेकिन जो लोग केवल पढ़ने पढ़ाने और सिर्फ ज्ञान की बातें करने में ही व्यस्त रहते हैं - 
जो न तो स्वयं ज्ञान को पूरी तरह से समझते हैं और न ही अपने अंदर ज्ञान का अनुभव कर पाते हैं - 
ऐसे लोग अज्ञान का अनुसरण करने वालों से भी अधिक गहन अन्धकार में हैं।  

क्योंकि वह सत्य - जो व्यावहारिक नहीं है - जिसे अनुभव न किया गया हो - 
जिसे रोज़मर्रा के जीवन में अपनाया न गया हो  - उसका कोई लाभ नहीं । 
वह किसी के लिए भी अच्छा नहीं है।
हम दिन भर ज्ञान का उपदेश कर सकते हैं -  
उच्च आदर्शों की बातें कर सकते हैं 
लेकिन जो विचारधारा और सिद्धांत व्यावहारिक नहीं हैं -
 जो अंतःकरण में नहीं समाए - 
जो जीवन का अंग नहीं बने - वो कभी फलदायी नहीं हो सकते। 

जैसा कि श्री शुकदेव मुनि ने भागवत पुराण में कहा है:
               श्रवणम - मननम - स्मरणम
पहले सुनो - ज्ञान प्राप्त करो
फिर मनन - जो ज्ञान मिला है उसका विश्लेषण करो - उसे ठीक से समझो 
और फिर स्मरण -  ज्ञान को याद रखना अर्थात अन्तःकरण में अनुभव करना और उसे जीवन में ढालना।
                                                    ' राजन सचदेव '

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