Monday, January 2, 2023

भर्तृहरि नीति शतक - विचारशील मनुष्यों की स्थिति

कुसुमस्तवकस्येव द्वयी वृत्तिर्मनस्विनः ।
मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य शीर्यते वन एव वा  ॥ 
                       (भर्तृहरि नीति शतक श्लोक 33 )

भावार्थ:
फूलों की तरह ही विचारशील मनुष्यों की स्थिति भी इस संसार में दो प्रकार की होती है।
या तो वे फूलों की तरह गले का हार - अर्थात सर्वसाधारण के प्रतिनिधि और शिरोमणि बन जाते हैं
या फिर वन (जंगल) के फूलों की तरह एकांत में - अकेले ही जीवन व्यतीत कर देते हैं।

No comments:

Post a Comment

Simplicity brings purity and humility

Many people often ask me about Bhapa Ram Chand Ji.  What was he like? What was his nature? In my opinion, Bhapa Ram Chand Ji’s greatest virt...