Wednesday, July 19, 2017

आज के दौर में ऐ दोस्त Aaj kay Daur mein aye Dost

आज के दौर में ऐ दोस्त  ये मन्ज़र क्यूँ  है 
ज़ख़्म हर सर पे - हर हाथ में पत्थर क्यूँ है 

जब हक़ीक़त है कि हर ज़र्रे में तू रहता है 
फिर ज़मीं पे कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है 

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी 
अपनी नज़रों में हर इक शख़्स सिकंदर क्यूँ है 

ज़िंदगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब शायद 
वरना हर आँख में अश्क़ों का समंदर क्यूँ है 


Aaj kay daur mein aye dost ye manzar kyun hai ?
Zakham har sar pay, har haath mein pathar kyun hai ?

Jab haqeeqat hai ki har zarray mein tu rehtaa hai
Phir zameen par kahin masjid kahin mandir kyun hai ?

Apnaa anjaam to maloom hai sab ko - phir bhi
Apni nazron mein har ik shakhs sikandar kyun hai ?

Zindagi jeeney ke qaabil hi nahin ab shaayed 
Warna har aankh mein ashqon ka samandar kyun hai ?

                                               (Writer unknown)





1 comment:

  1. Very beautiful and heart touching thought

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