Friday, September 4, 2015

ये ​ज़ुबां किसी ने खरीद ली

ये ​ज़ुबां किसी ने खरीद ली, क़लम किसी की ग़ुलाम है 
सोच पर पहरे लगे हैं,  दिल पे पड़ी लगाम है 

न अक़्ल ही आज़ाद है, न होश का कोई काम है 
​रूह पे परदा पड़ गया है - ज़िंदगी गुमनाम है 

छुप गयीं हक़ीक़तें - रस्मों का चर्चा आम है

इबादतें भी आजकल रिवायतों का नाम है

सच का सूरज छुप रहा है ढल रही अब शाम है 
ख़ामोशियाँ ही बेहतर हैं, ये वक़्त का पैग़ाम है ​

हक़ूमतों का ​दौर ​है, दौलत का एहतिराम है
​वो - कि जो आज़ाद है, 'राजन' उसे सलाम है                             
           
                            'राजन सचदेव' 

हक़ीक़तें -- Realities, Truth
रस्मों का -- Traditions , Rituals 
इबादतें --  Devotion
रिवायतों का --  Rituals
एहतिराम -- Respect, Value, Importance


3 comments:

  1. kya khoob kaha hai ji...Waah
    Regards
    Kumar

    ReplyDelete
  2. बहुत खूब राजन जी

    ReplyDelete
  3. Beautiful !!!!!
    Billa Sachdeva

    ReplyDelete

शायरी - चंद शेर Shayeri - Chand Sher (Few Couplets)

न जाने  डूबने वाले ने  क्या कहा  समंदर से  कि लहरें आज तक साहिल पे अपना सर पटकती हैं   Na Jaane doobnay waalay ne k ya kahaa s amander s...