Friday, October 1, 2021

हर एक कर्म चार चरणों में पूरा होता है

किसी भी कर्म को करने के लिए चार चरण अथवा चार पड़ाव होते हैं। 
- इच्छा, संकल्प, विकल्प और क्रिया

उदाहरण के लिए, एक सज्जन को चाय पीने की इच्छा हुई।
लेकिन अगले ही पल उन्हों ने सोचा - नहीं... अभी नहीं - बाद में देखेंगे।
और वहीं उस इच्छा का अंत हो गया।
वह इच्छा अगले चरण पर नहीं पहुंची और वास्तविक क्रिया में नहीं बदली।

दूसरे परिदृश्य में:
1. इच्छा --  चाय पी जाए 
2. संकल्प - हां, चाय पीनी ही है।
3. यदि पहला चरण - अर्थात इच्छा संकल्प में बदल जाए, तो अगला कदम होगा:
     विकल्प (योजना एवं विधि) --- इसे कैसे प्राप्त करें।
इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कई विकल्प हो सकते हैं।
  • रसोई में जाकर स्वयं चाय बना ली जाए
  • या किसी और को चाय बनाने के लिए कहा जाए
  • या बाहर जा कर किसी दुकान या रेस्टोरेंट से चाय लाई जाए
  • या अगर संभव हो तो फोन पर ऑर्डर करके डिलीवर करवा ली जाए।
तो इस तरह हम देखते हैं कि वास्तविक क्रिया केवल इच्छा पर ही निर्भर नहीं होती। 
वास्तविक कर्म असल में संकल्प और विकल्प पर निर्भर करते हैं। 
और अलग अलग विकल्प के अनुसार उनके परिणाम अलग भी हो सकते हैं। 

हो सकता है कि विचारों और इच्छाओं पर हम पूर्ण रुप से नियंत्रण न कर पाएं
लेकिन संकल्प को नियंत्रित किया जा सकता है।

सचेत रुप से अपने विचारों और इच्छाओं को देखने और जांचने का अभ्यास करके हम यह चुनाव कर सकते हैं कि किस विचार एवं इच्छा को क्रिया में बदलना है और किसे नहीं।

यदि हम कोई लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं - जैसे कि अपनी जीवन शैली को बदलना - अपने जीवन में सुधार लाना और अपने आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त करना - ये सब केवल इच्छा करने या मांगने से ही पूरा नहीं हो सकता।

इच्छा को पहले दृढ़ संकल्प में बदलना होगा - और फिर सही और उचित प्रक्रिया खोज कर उस पर काम करना होगा।
हर कार्य की सिद्धि और लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अभ्यास की ज़रुरत पड़ती है।
                                              ' राजन सचदेव '

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