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Wednesday, July 22, 2026

आँगन और छत

             आँगन की ये ख़्वाहिश है कि रिमझिम की हो बरसात
                और छत का तक़ाज़ा है कि इक बूँद न बरसे 
                                                    (अज्ञात लेखक )  

भावार्थ:
जीवन में अक्सर ऐसा होता है कि जो चीज़ किसी एक के लिए सुख का कारण होती है, वही किसी दूसरे के लिए चिंता या कष्ट का कारण बन सकती है। 
जैसे आँगन चाहता है कि रिमझिम वर्षा हो। जिसमें सारा कूड़ा-कचरा बह जाए और घास और पौधों को पानी भी मिल जाए। 
लेकिन घर की जर्जर छत प्रार्थना करती है कि बारिश की एक बूँद भी न गिरे। 

अर्थात, कभी कभी जीवन की परिस्थितियाँ और मजबूरियाँ ऐसी होती हैं कि एक ही घर में दो विपरीत इच्छाएँ साथ-साथ रहती हैं। 
इसलिए जीवन में कोई भी निर्णय लेते समय इच्छाओं के साथ-साथ परिस्थितियों का भी ध्यान रखना आवश्यक है। 
केवल अपनी चाहत और परिस्थिति का ही नहीं, बल्कि दूसरों की परिस्थितियों और आवश्यकताओं को भी समझने का प्रयास करना चाहिए। 
                                              " राजन सचदेव "

Monday, July 20, 2026

सुमति कुमति सब कै मन माहिं

    सुमति कुमति सबके उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
    जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
                                                  " रामचरित मानस "
 अर्थ : 
हे नाथ ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि, अच्छे विचार और सद्भावना) और कुबुद्धि (खोटी बुद्धि, इर्ष्य,द्वेष,एवं बुरे विचार) सबके हृदय में रहती है। 
दुसरे शब्दों में - केवल मात्रा का ही अंतर होता है। आम तौर पर हर इंसान के मन में कुछ न कुछ सदभावना और दुर्भावना - अच्छे और बुरे विचार उठते ही रहते हैं। 
कुछ लोगों के मन में अधिकतर सद्भावना और अच्छे विचार ही उठते हैं और कुछ लोगों के मन में हमेशा दूसरों के प्रति दुर्भावना ही रहती है। 

संत तुलसीदास जी कहते हैं कि जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकार की सम्पदाओं, सुख समृद्धि एवं शांति का निवास रहता है 
और जहाँ कुबुद्धि है वहाँ विभिन्न प्रकार की विपत्तियों एवं दुःख का वास रहता है। 
अर्थात यदि विचारों को बदल लें तो जीवन बदल सकता है। 
यदि मन में अच्छे विचार और सबके प्रति सद्भावना होगी - किसी के प्रति ईर्ष्या और द्वेष की भावना नहीं रहेगी तो मन शांत रहेगा और जीवन में सुख एवं शान्ति बनी रहेगी। 
                                              " राजन सचदेव "

Tuesday, March 17, 2026

धारणात्मक सत्य अर्ध-सत्य है

जिसे हम अपने दैनिक जीवन में अक्सर ‘सत्य’ समझ लेते हैं, वह हमेशा पूर्ण सत्य नहीं होता।
अधिकतर वह केवल अनुभूत अथवा धारणात्मक सत्य (Perceptual Truth) होता है  
—वह सत्य जो हमें अपने सीमित अनुभवों, भावनाओं, संस्कारों और व्यक्तिगत पक्षपात के चश्मे से दिखाई देता है। 

यही अनुभूत सत्य हमारे शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार को संचालित करता है।
यही हमारी प्रतिक्रियाओं, विचारों, धारणाओं और पसंद-नापसंद इत्यादि को आकार देता है।
और हमें विश्वास हो जाता है कि जो हम देख रहे हैं - सोच और समझ रहे हैं, वही वास्तविकता है - वही सत्य है। 

धारणाएँ मन को एक प्रकार का संतोष और तुष्टि प्रदान करती हैं। 
हम तुरंत इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि हमारी धारणाएं - हमारा अनुभूत सत्य  ही पूर्ण सत्य है और हम निरंतर उसे सत्य सिद्ध करने का प्रयास भी करते रहते हैं। 
इससे अहंकार को संतुष्टि मिलती है - एक निश्चितता का भाव उत्पन्न होता है—भले ही वह निश्चितता अधूरी ही क्यों न हो। 
इसीलिए अधिकतर लोग अपनी धारणाओं से ऐसे चिपके रहते हैं मानो वही अंतिम सत्य हो। 
परंतु वास्तविकता में वह केवल आधा सत्य होता है, क्योंकि धारणाएं सदैव सीमित होती हैं। 
धारणाएं और मान्यताएं हमारी परवरिश, संस्कृति, व्यक्तिगत अनुभवों, और वातावरण से प्रभावित होती हैं।
दो व्यक्ति एक ही घटना को अपने-अपने ढंग से देख कर अलग-अलग निष्कर्ष निकाल सकते हैं —
और मज़े की बात ये है कि दोनों ही दृढ़ता से ये मानते हैं कि उनकी धारणा ही सही है। 
हर व्यक्ति अपनी धारणाओं तथा मान्यताओं को ही सही और सत्य मानता है। 
लेकिन हो सकता है कि कोई भी पूर्ण सत्य का प्रतिनिधित्व न करता हो। 

इसलिए आत्मचिंतन और निष्पक्ष मनन आवश्यक हैं। 
बुद्धिमत्ता की शुरुआत उसी क्षण होती है जब हम यह स्वीकार करने लगते हैं कि हम जो देखते, सोचते और समझते हैं, वही हमेशा पूर्ण सत्य नहीं होता। 

धारणाएं हमारे अहंकार को संतुष्ट करती हैं 
और आत्मचिंतन सत्य को प्रकट करता है। 
धारणाएं कहती हैं कि जो दिखाई दे रहा है, वही सत्य है।
आत्मचिंतन धीरे-धीरे वास्तविक सत्य को प्रकट करता है।
पूर्ण सत्य केवल सतही अवलोकनों और तुरंत निकाले गए निष्कर्षों से प्रकट नहीं होता।
वह तो चिंतन, ध्यान और मनन के माध्यम से धीरे-धीरे प्रकट होता है। 

चिंतन एवं मनन से आत्मबोध (Realization) उत्पन्न होता है—
और बोध के साथ आता है आंतरिक समन्वय।
चिंतन, ध्यान और मनन के माध्यम से व्यक्ति तात्कालिक प्रतिक्रियाओं से ऊपर उठ कर वास्तविकता को समझने का प्रयास करने लगता है। 
जब हम अपने अंतर्मन में देखने लगते हैं - जब हम अपनी धारणाओं विचारों तथा मान्यताओं को ईमानदारी से परखने लगते हैं - तब धीरे-धीरे हमारे भीतर कुछ गहरी संवेदनाएं उभरने लगती हैं। 
हम पुरानी धारणाओं और मान्यताओं से ऊपर उठकर व्यापक दृष्टि से देखने लगते हैं। 
अहंकार की पकड़ धीरे-धीरे ढीली पड़ने लगती है। 
मन शांत होने लगता है, अहंकार विनम्रता में बदल जाता है, और जीवन में एक गहरी स्पष्टता प्रकट होने लगती है। 
और अंततः जीव स्वतंत्र हो जाता है—बंधनों से परे, मुक्त।
                                  " राजन सचदेव "

Thursday, October 23, 2025

ज्योतिरात्मनि नान्यत्र (प्रकाश आपके अंदर ही है)

                ज्योतिरात्मनि नान्यत्र
       (महाभारत शान्तिपर्व 326/32)


अर्थ :
प्रकाश आपके अपने अंदर है - अन्यत्र नहीं 
अर्थात बाहर किसी और जगह पर नहीं 

महाभारत के विद्वान लेखक और महान ऋषि कहते हैं कि प्रकाश का पुंज कहीं बाहर या किसी और जगह पर नहीं है।
यह आपके भीतर ही है।
इसलिए, प्रकाश - सुख और शांति को बाहर या किसी अन्य स्थान पर नहीं, बल्कि अपने भीतर ही खोजना चाहिए। 

दूसरों से प्रेरणा तो मिल सकती है - पथ प्रदर्शन तो मिल सकता है 
लेकिन अंततः तो स्वयं अपने अंदर ही झाँक कर - स्वयं का निरपेक्ष निरीक्षण करके सत्यमार्ग पर आगे बढ़ने का प्रयास करने से ही जीवन कल्याणमयी हो सकता है।  
           " राजन सचदेव "

Monday, September 29, 2025

जब तक साँस चलती है

              उठाना ख़ुद ही पड़ता हैं थका टूटा बदन ‘फ़ख़री’
              कि जब तक साँस चलती है कोई कन्धा नहीं देता!
                                           - ज़ाहिद फ़ख़री  -

ज़ाहिद फ़ख़री का यह सरल सा दिखने वाला शेर जीवन की एक कड़वी सच्चाई की तरफ इशारा करता है: कि अक़्सर कठिन समय में, जब हमें किसी के सहारे की सख़्त ज़रुरत महसूस होती है, तो बहुत कम लोग ही साथ खड़े होने और मदद करने के लिए आगे आते हैं।
हर किसी को अपनी यात्रा का बोझ खुद ही उठाना होता है।
हो सकता है कि कुछ लोग कुछ समय के लिए हमारे साथ चल पड़ें, कुछ दिलासा देने वाले शब्द कह दें या कुछ समय के लिए साथ बैठ जाएँ - लेकिन जब ज़िंदगी का बोझ ज़्यादा बढ़ जाए -  जब हिम्मत डगमगाने लगे, तो स्वयं को फिर से खड़ा करने की ताकत स्वयं ही जुटानी पड़ती है। 
हमें अपना बोझ खुद ही उठाना होता है। 

ये कैसी विडंबना है - कितनी अजीब बात है - कि जब सांस रुक जाती है, तो अर्थी को कंधा देने के लिए अचानक ही असंख्य लोग आगे आ जाते हैं। 
लेकिन जब सांसें चल रही होती हैं और इंसान संघर्ष कर रहा होता है, तो बहुत कम लोग सहायता के लिए और सही मायने में साथ देने के लिए आगे आते हैं। 

इसलिए जीवन में कभी दूसरों पर ज़्यादा निर्भर नहीं रहना चाहिए।
हमेशा दूसरों से उम्मीद न रखें कि वे आपको सहारा देने आएंगे।
जीवन का रास्ता अकेले ही तय करना होता है, 
और जीवन की असली गरिमा भी इसी में है कि हम स्वयं ही अपने रास्ते का चयन करें और अपना बोझ भी स्वयं ही उठाने का प्रयत्न करें।” 
                                         " राजन सचदेव "

Tuesday, September 9, 2025

पारस कै संग परस के कंचन भई तलवार

                 पारस कै संग परस के कंचन भई तलवार
                  तुलसी तीनों न मिटे - धार मार आकार

राम चरित मानस के रचयिता संत तुलसी दास इस दोहे के माध्यम से अध्यात्मिक जीवन के एक कटु सत्य की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं l
वह कहते हैं कि जैसे एक लोहे की तलवार पारस पत्थर का स्पर्श करके सोना तो बन जाती है लेकिन उसका आकार और गुण वैसे का वैसा ही रहता है l
उसकी तीक्ष्णता और कार्यप्रणाली पहले जैसी ही रहती है।
बेशक उसमें चमक तो आ जाती है और उसकी कीमत भी कई गुना बढ़ जाती है। वह दर्शनीय और प्रशंसनीय भी बन जाती है लेकिन न तो उसका आकार बदलता है - और न ही उसकी पैनी तीखी धार। और न ही उसका मार काट करने वाला गुण ही बदलता है l
भले ही वो तलवार अब सोने में बदल चुकी है लेकिन फिर भी यह किसी को घायल करने में सक्षम है और अगर कोई उसे दबाने अथवा उसके रास्ते में आने या बाधा बनने की कोशिश करे तो उसे काट भी सकती है।
(प्राचीन काल की गाथाओं में पारस पत्थर का ज़िक्र मिलता है। केवल भारत में ही नहीं बल्कि पश्चिमी देशों में भी ऐसी मान्यता थी कि कोई भी धातु पारस पत्थर के सम्पर्क में आते ही या उसे छूते ही सोने में परिवर्तित हो जाती है। ग्रीक माईथोलोजी और अरबी साहित्य में भी पारस और अमृतजल अथवा आबे ज़मज़म इत्यादि का ज़िक्र मिलता है।)

इस दोहे में तुलसी दास जी इस मान्यता का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जिस तरह पारस का स्पर्श करके एक लोहे की तलवार सोने में तो परिवर्तिति हो जाती है लेकिन उस का गुण और कर्म नहीं बदलता।
उसी तरह ज्ञान प्राप्ति के बाद सत्संग एवं संतों के सानिध्य से जीवन में सुख तथा यश और मान तो मिलने लगते हैं लेकिन इन्सान का स्वभाव आम तौर पर नहीं बदलता l
जिनके स्वभाव में पहले से ही विनम्रता हो वो हमेशा विनम्र ही बने रहते हैं l
लेकिन जिनके ह्रदय में स्वभाविक रुप से ही अभिमान और दम्भ हो -
जिन के मन में स्वयं को दर्शाने तथा लीडर शिप की भावना और इच्छा होती है, वो अध्यात्मिक क्षेत्रों में भी स्वयं को दर्शाने - दूसरों से आगे रहने और सब पर नियंत्रण रखने का यत्न करते रहते हैं।

तो क्या इसका अर्थ ये हुआ कि इन्सान का स्वभाव कभी नहीं बदल सकता ?
दूसरे दोहे में संत तुलसी दास जी कहते हैं कि एक उपाय है जिस से स्वभाव को बदला जा सकता है l
               "ज्ञान हथौड़ा जे मिले, सतगुरु मिले सुनार
                 तुलसी तीनों मिट गए धार मार आकार "
तलवार की धार और आकार को हथौड़े से बार बार चोट करके बदला जा सकता है l 
उसे स्वर्ण कलश, स्वर्ण आभूषण या स्वर्ण मूर्ति में रुपान्तरित करके उसके मार काट करने के गुण को भी बदला जा सकता है l
इसी तरह संतों के वचनों को बार बार सुनना और ज्ञान को बार बार अपने ह्रदय में दोहराना एक प्रकार से हथौड़े का काम करता है जिस से धीरे धीरे इंसान का गुण और स्वभाव बदलने लगता है।
लेकिन गुरु ज्ञान और संतों के वचनों की चोट कानों पर नहीं, ह्रदय पर पड़ेगी तभी स्वभाव बदलेगा .… अन्यथा नहीं। 
                                      " राजन सचदेव "

Friday, September 5, 2025

शुभ शिक्षक दिवस

  


         एक अच्छे शिक्षक का प्रभाव कभी मिटाया नहीं जा सकता

पहले तो एक प्रेरणादायक शिक्षक का मिलना ही कठिन होता है 
और अगर मिल जाए तो उनसे अलग होना और भी कठिन है - 
और उन्हें भुला पाना तो असंभव है।
क्योंकि शिक्षक अपने विद्यार्थियों पर सीधा प्रभाव डालते हैं। 

शिक्षक व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का चरित्र निर्माण करते हैं।
शिक्षक वह दीपक है, जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है।
वे विद्यार्थियों को शिक्षित करने, शिक्षा के लिए प्रेरित करने और हमेशा उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए प्रयासरत रहते हैं।

वैसे तो विद्यालय के पहले दिन से लेकर शिक्षण के अंत तक हम अनेक शिक्षकों से पढ़ते और सीखते हैं।
परंतु कुछ शिक्षक ही ऐसे होते हैं जो जीवनभर हमारी स्मृतियों में बने रहते हैं।
क्योंकि वे हमारी प्रगति में व्यक्तिगत रुचि और जिम्मेदारी निभाते हैं।
वे अपने विद्यार्थियों का हाथ थामते हैं, उनका मस्तिष्क खोलते हैं और उनके हृदय को छूते हैं। 
ऐसे हृदयस्पर्शी शिक्षक सदा के लिए विद्यार्थियों के आदर्श बन जाते हैं। 
इसी कारण, प्राचीन भारतीय परंपराओं में शिक्षक अथवा गुरु को समाज द्वारा सर्वोच्च सम्मान और आदर प्रदान किया गया है।
        गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः  
        गुरु: साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।   
                                       (गुरु गीता)  
             गुरु ईसर, गुरु गोरख ब्रह्मा, गुरु पारबती माई
                                          (जपुजी साहिब)
भारतीय सनातन संस्कृति में माता, पिता और गुरु को देवी एवं देवता का स्थान दिया गया है।
                " मातृदेवो भव - पितृदेवो भव - गुरुर्देवो भव "

महान गुरु और श्रेष्ठ शिक्षक केवल पढ़ाते ही नहीं हैं - वे अपने शिष्यों और विद्यार्थियों के मन में ज्ञान के ऐसे बीज बोते हैं जो जीवनभर बने रहते हैं - और पनपते रहते हैं।
वे हर कदम पर शिष्यों का मार्गदर्शन और सहयोग करते हैं, ताकि वे विषय को पूर्ण रुप से समझ सकें और ऐसी ऊँचाइयों तक पहुँच सकें जिसकी आकाश ही सीमा है। 
      एक महान शिक्षक - एक महान गुरु का मिलना सौभाग्य की बात है 
ऐसा गुरु जो आपके जीवन के हर चरण पर स्वयं व्यक्तिगत रुप से आपका मार्गदर्शन करे - 
आपके हर प्रश्न का उत्तर दे और आपके सभी संदेहों को दूर करे। 
एक कुशल और अनुभवी शिक्षक अथवा गुरु कभी भी यह नहीं कहेगा कि प्रश्न पूछना बंद करो, चुप रहो या बिना किसी संदेह और उज्र के उनकी हर बात को मान लो। अच्छे शिक्षक हमेशा आपको तब तक प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करेंगे जब तक कि आप पूरी तरह संतुष्ट न हो जाएँ। 
क्योंकि सच्चे ज्ञानी शिक्षक और गुरु केवल रटा रटाया ज्ञान नहीं देते बल्कि आपको स्वयं सोचने और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। वे आपको ज्ञान चक्षु खोल कर अपने मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देते हैं।
महान गुरु और अच्छे शिक्षक अपने विद्यार्थियों को अपने जैसा ही ज्ञानवान बनने - बल्कि अपने से भी श्रेष्ठ बनने के लिए प्रेरित करते हैं। 
सच्चे गुरु या शिक्षक अपने विद्यार्थियों से कभी ईर्ष्या नहीं करते।
बल्कि यदि कोई विद्यार्थी उनसे आगे भी बढ़ जाएँ तो वे उन पर गर्व ही करते हैं। 

यजुर्वेद का एक मंत्र - जो तैत्तिरीय, माण्डूक्य और श्वेताश्वतर उपनिषदों में भी मिलता है - एक प्रार्थना के रुप में गुरु और शिष्य के बीच सुंदर संबंध का वर्णन करता है। 
              **ॐ सह नाववतु - सह नौ भुनक्तु - सह वीर्यं करवावहै  
                               तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै  
                                   ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः**  
अर्थ:
हे परमब्रह्म! हमें (गुरु और शिष्य दोनों को) साथ-साथ सुरक्षित रखें;
हम दोनों का साथ-साथ पोषण करें;
हम साथ मिलकर साहस एवं पराक्रम के साथ हर कार्य करें;
हमारा ज्ञान एवं सोच उज्ज्वल और फलदायी हो।
हम दोनों - गुरु और शिष्य कभी एक-दूसरे से ईर्ष्या न करें।

पूरी दुनिया में लाखों लोग इस दिन को अलग-अलग तरीकों से मनाकर शिक्षकों का सम्मान करते हैं।
किन्तु उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि हम उनके ज्ञान और उपदेशों को सीखें, समझें और अपने जीवन में आत्मसात करें।
और शिक्षकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वे विद्यार्थियों को हमेशा सीखते ही रहने के लिए प्रेरित करें - आगे से आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। 

मेरे सौभाग्य है कि मुझे जीवन में कुछ ऐसे महान शिक्षक और गुरु मिले, जिन्होंने न केवल मेरे सामाजिक और पेशेवर जीवन में, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में मेरा मार्गदर्शन किया।
उन्होंने मेरे दृष्टिकोण को विस्तृत किया, संकीर्ण मानसिकता की दीवारें तोड़ीं, सीमित सोच से बाहर निकलने में मदद की, और मुझे उदार, विशाल दृष्टिकोण रखने और सार्वभौमिक रुप से सोचने के लिए प्रेरित किया।

मेरे उन सभी शिक्षकों और गुरुओं को मेरा नमन और आभार, जिन्होंने मुझे आज जो कुछ भी मैं हूँ - वह बनने में मेरी सहायता की।

आइए - हम उन सभी शिक्षकों और गुरुओं के योगदान की सराहना करें - उनके प्रति कृतज्ञता का भाव समर्पित करें जो हमारे भविष्य का निर्माण करते हैं।
              " एक अच्छे शिक्षक का प्रभाव कभी मिटाया नहीं जा सकता "
                                                         राजन सचदेव  





Thursday, August 28, 2025

हम वही सुनते हैं जो सुनना चाहते हैं

हम जीवन में बहुत सी बातें सुनते हैं - 
लेकिन हम उन्हें वैसे नहीं सुनते जैसे वे वास्तविकता में होती हैं — 
हम वो सुनते हैं जैसे हम हैं - या जो हम सुनना चाहते हैं ।
हर शब्द हमारी अपनी धारणा और हमारी समझ से छनकर आता है।
हम जो भी सुनते हैं उसे अपनी धारणा, अपनी समझ और अपनी उस समय की मनःस्थिति के अनुसार उसका अर्थ निकाल कर उसकी व्याख्या करते हैं। 

उदाहरण के तौर पर भगवद् गीता में भगवान कृष्ण के उपदेश को ही ले लें।
इसे तीन लोगों ने - अर्जुन, धृतराष्ट्र और संजय ने सुना।
संवाद के अंत में अर्जुन ने प्रणाम किया और कहा: 
                 नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत |
                स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव || 
                                 (भगवद् गीता अध्याय 18 - श्लोक 73)

हे अच्युत - हे कृष्ण - आपकी कृपा से मेरा मोह दूर हो गया है, मुझे ज्ञान की उपलब्धि हो गई है। 
अब मैं ज्ञान में स्थित और संशय मुक्त हूँ। और आपके वचनानुसार ही कार्य करुंगा।

लेकिन धृतराष्ट्र की सोच कुछ और थी। 
उसकी सोच अर्जुन की सोच से अलग थी। 
उसने सोचा कि अर्जुन तो युद्ध न करने और हार मानने को तैयार था लेकिन कृष्ण ने चालाकी से उसे युद्ध के लिए राजी कर लिया। 

और तीसरा संजय - 
उस ने गीता का उपदेश - कृष्ण और अर्जुन का सारा वार्तालाप धृतराष्ट्र को सुनाया - 
लेकिन वह स्वयं उससे अछूता - अविचलित और अप्रभावित रहा। 
उसे कुछ भी छू नहीं पाया - उसके लिए कुछ भी नहीं बदला।

शब्द वही थे - संदेश भी वही था 
लेकिन फिर भी तीन अलग अलग परिणाम। 

एक के लिए कृष्ण मुक्तिदाता थे।
दूसरे के लिए वे चालाक नीतिवान थे।
और तीसरे को कोई भी फर्क नहीं पड़ा। 

इससे पता चलता है कि ज्ञान की समझ और उपयोगिता प्राप्तकर्ता पर निर्भर करती है। 
ज्ञान की शक्ति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि इसे ग्रहण करने वाले के हृदय और मन में निहित है।
यही ज्ञान का वास्तविक स्वरुप है।
ज्ञान से भी अधिक महत्वपूर्ण है कि ज्ञान को कैसे समझा और प्रयोग किया जाता है। 
जीवन में ज्ञान का अर्थ और उपयोगिता पूरी तरह से श्रोता या प्राप्तकर्ता की धारणा, समझ और मनःस्थिति पर निर्भर करती है।
                                                              " राजन सचदेव "

Wednesday, August 27, 2025

शुभ गणेश चतुर्थी एवं भगवान गणेश का प्रतीकात्मक स्वरुप

भगवान गणेश को आदि देव, शुभ-लाभ के देवता और विघ्नहर्ता माना जाता है।
पश्चिमी जगत में उन्हें अज्ञानवश “Elephant God” कह दिया जाता है और एक अजीब-सा हास्यास्पद प्रतीक समझ कर मज़ाक़ भी किया जाता है। 
परंतु वास्तविकता में देवताओं की मूर्तियाँ जैसी दिखाई देती हैं, शाब्दिक एवं वास्तविक अर्थ में वैसी नहीं होतीं।  उनके अंग-प्रत्यंग, रंग, चिह्न और आसपास रखी वस्तुएँ गहरे प्रतीकात्मक अर्थ रखती हैं।
यदि हम इन प्रतीकों को ध्यान से देखें और विचारात्मक दृष्टि से समझने का प्रयास करें  तो इन विचित्र-सी लगने वाली छवियों के भीतर छिपा आध्यात्मिक और व्यावहारिक संदेश स्पष्ट हो जाता है।
                  गणेश का अर्थ है: 
गणेश (गण + ईश) → लोगों का - जनता अथवा प्रजा का ईश्वर 
गणपति (गण + पति) → जनता अथवा प्रजा का नेता

अन्य हिन्दू देवताओं की तरह गणेशजी की प्रतिमा भी दो स्तरों पर संदेश देती है—
समाज और जगत में नेतृत्व के गुण।
आध्यात्मिक साधना और मोक्ष की राह के संकेत।

                          भौतिक जगत में गणपति के प्रतीक का अर्थ 
गणपति को महान नेता और रक्षक का प्रतीक माना गया है—जो समाज की रक्षा करते हैं, विघ्न दूर करते हैं और शक्ति तथा करुणा से नेतृत्व करते हैं।
हाथी का सिर → शक्ति, आत्मविश्वास और संरक्षण।
विशाल सिर → बुद्धि और अनोखी सोचने की क्षमता। 
छोटा मुख और बड़े कान → कम बोलना, अधिक सुनना। 
छोटी आँखें → अनुयायियों की कमियाँ अनदेखी करके मार्गदर्शन करना।
एक दाँत (एकदंत) → केवल लोक-कल्याण हेतु कार्य करना। 
बड़ा पेट → रहस्य को अपने भीतर रखना, आलोचना-सम्मान दोनों को शांत भाव से सहना।
लचीली सूँड  - परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने और दूरदर्शिता से संसाधन जुटाने की क्षमता 
चार हाथ – नेतृत्व के साधन - अधिक काम करने की क्षमता 
रस्सी → समाज को दुःख-दरिद्रता से ऊपर उठाना।
परशु (कुल्हाड़ी) → बुराइयों और कुप्रथाओं का नाश।
मोदक (मिठाई) → कर्मफल और सुखद परिणाम देने का वचन।
आशीर्वाद मुद्रा → सुरक्षा और संरक्षण का आश्वासन।
मूषक (चूहा) वाहन - चूहा लालच और चोरी का प्रतीक है। गणपति उसे अपने चरणों में दबाकर यह दर्शाते हैं कि सच्चा नेता ऐसे स्वभावों को नियंत्रित रखता है।

                       आत्मिक साधना में गणेश का प्रतीक
आध्यात्मिक दृष्टि से गणेश मन का प्रतीक हैं—जो इन्द्रियों का स्वामी है। 
उनके स्वरुप का प्रत्येक अंग साधकों को गहरा संदेश देता है।
विशाल सिर -  ज्ञान और गहन विचार-शक्ति।
छोटा मुख और बड़े कान  - मौन (मौन साधना) और श्रवण (सत्य को ध्यान से सुनना)।
छोटी आँखें -  एकाग्रता और लक्ष्य पर ध्यान। 
एकदंत -  सकारात्मक को ग्रहण करना, नकारात्मकता को त्यागना।
विशालकाय पेट → सुख-दुःख दोनों को समान भाव से सहन करने की शक्ति।
चार हाथ – साधना के साधन - सांसारिक तथा आध्यात्मिक दोनों में कार्यरत रहने की क्षमता।
रस्सी - स्वयं को नकारात्मकता से ऊपर खींचना, मुक्ति की ओर बढ़ना।
परशु (कुल्हाड़ी) - अस्थायी भौतिक वस्तुओं से मोह तोड़ना।
मोदक (लड्डू)  -  जीवन की मिठास और सकारात्मकता को सँजोना।
आशीर्वाद मुद्रा -  निर्भयता (अभय) और आत्मविश्वास।
चरणों के नीचे मूषक (चूहा) - चूहा लोभ और संग्रह की प्रवृत्ति का प्रतीक है। ज्ञानी मन इन प्रवृत्तियों को वश में रखकर सादगी और ईमानदारी से जीवन जीता है।
                                            गहन संदेश 
गणेश जी की प्रतिमा अथवा चित्र को वास्तविक रुप से नहीं, बल्कि प्रतीक के रुप में देखना चाहिए। यदि सही और निष्पक्ष भाव से इन्हें देखें तो इन प्रतीकों से हमें सही नेतृत्व के गुण और आत्मिक प्रगति के साधन - दोनों ही मिलते हैं।
पुरातन शास्त्रों, परंपराओं और रीति-रिवाजों के भीतर छिपे सत्य को समझें और उनका सार ग्रहण करें—न तो अंधानुकरण करें और न ही उनका उपहास उड़ाएँ।
                                     " राजन सचदेव "


Monday, August 25, 2025

नमस्कार -- प्रेम एवं आदर का प्रतीक

नमस्कार प्रेम एवं आदर का प्रतीक है। 
जब हम किसी को नमस्कार करते हैं तो ये हमारी अपनी विनम्रता और उनके प्रति हमारे प्रेम और आदर की सूचना देता है। 

लेकिन अगर हम यह सोचकर किसी को नमस्कार करते हैं कि वो भी पलट कर हमें उसी तरह से नमस्कार करेगा तो हमारा नमस्कार करना व्यर्थ है ! 
क्योंकि नमस्कार तो विशुद्ध प्रेम और आदर की भावना से किया जाना चाहिए - किसी अपेक्षा से या केवल औपचारिकता निभाने के लिए नहीं। 

नमस्कार करने के बाद सामने वाले से भी वैसी ही अपेक्षा करना केवल अहंकार दर्शाता है - प्रेम नहीं। 
                                 " राजन सचदेव "

Saturday, July 5, 2025

कबीर कसौटी राम की, झूठा टिके ना कोई


                  कबीर कसौटी राम की, झूठा टिके ना कोई।
                     राम कसौटी सो सहे, जो मर जीवा होए॥
           अनुवाद:
राम की कसौटी पर कोई भी झूठ या असत्य टिक नहीं सकता।
इस कसौटी को वही सह सकता है जो पहले मर कर फिर जीवित हुआ हो 
  अथवा 
जो इस कसौटी पर खरा उतरता है — वह मृत्यु को भी पार कर जाता है - वह मर कर भी जीवित रहता है।
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अर्थात असत्य, झूठ और माया, राम की कसौटी पर टिक नहीं सकते।
"राम की कसौटी"  सत्य, धर्म और पवित्रता का प्रतीक है।
जो व्यक्ति सत्य और तत्व ज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता है, वही वास्तव में मृत्यु को पार कर सकता है — और अमर हो जाता है। 

सद्गुरु कबीर जी कहते हैं कि जैसे सोने की शुद्धता को परखने के लिए कसौटी होती है, वैसे ही आत्मा की शुद्धता को परखने के लिए ‘राम की कसौटी’ है — अर्थात् तत्व-ज्ञान, सत्य का बोध।
जैसे सोने को कसौटी पर रगड़कर उसकी असलियत जानी जाती है — वैसे ही हमारे जीवन की सच्चाई, हमारे विचारों और कर्मों की पवित्रता, इस दिव्य कसौटी पर परखी जाती है। 

यहाँ 'राम' सिर्फ एक व्यक्ति या देवता नहीं हैं।
राम एक प्रतीक हैं — सत्य, धर्म, पवित्रता और तत्व-ज्ञान का प्रतीक।
कबीर जी कहते हैं कि सत्य के सामने झूठ, अहंकार, दिखावा या प्रपंच इत्यादि नहीं ठहर सकते। वे स्वयंमेव ही उजागर हो जाते हैं। सत्य के प्रकाश में उनका अस्तित्व टिका नहीं रह सकता। 
केवल वही व्यक्ति इस कसौटी को सह सकता है, जो भीतर से सच्चा, निर्मल और पवित्र  हो — जो आध्यात्मिक रुप से जागृत हो।

"जो मर जीवा होए"  का अर्थ है - अहंकार की मृत्यु, माया अर्थात भ्रम एवं अन्धविश्वास की मृत्यु, तथा आत्म-मोह की मृत्यु। मानो वह मरकर फिर से एक नए रुप में जन्म ले चुका हो।
यह एक संकेत है — उस व्यक्ति की ओर जो अहंकार और माया को त्यागकर नया जन्म लेता है — आत्मिक पुनर्जन्म। 

ऐसा व्यक्ति राम से जुड़ा रहता है — 
वह सत्य से एकाकार होता है और मोक्ष पदवी को प्राप्त कर लेता है। 
वह आत्मा परम सत्य में विलीन हो जाती है।
बेशक उसका शरीर तो नश्वर है, पर उसका सत्य पर आधारित और सद्गुणों से जुड़ा हुआ जीवन चिरस्थायी बन जाता है और वह वास्तव में कभी नहीं मरता।

कबीर जी का यह संदेश आज के युग में और भी अधिक उपयुक्त लगता है — जहाँ बाहरी चमक और नकली दिखावा सत्य से ज़्यादा मूल्यवान प्रतीत होते हैं।
इस दोहे में कबीर जी हमें सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
वे कहते हैं: “राम से जुड़ो, सत्य से जुड़ो — तब ही तुम्हारा जीवन सच्चा और अमर बन सकेगा। 
                                               " राजन सचदेव "

Wednesday, April 9, 2025

सागर महान क्यों है?

सागर क्यों महान है?

क्योंकि वह सभी जलधाराओं से नीचे स्थित है।
और क्योंकि वह सभी जलधाराओं से नीचे है - असंख्य नदियाँ 
स्वयंमेव ही उसकी ओर बहती चली आती हैं 
— उसमें समा जाने के लिए।

सागर की महानता ऊँचाई में नहीं - बल्कि उसकी विनम्रता और नीचे होने में है।
नदियाँ कभी ऊँचे शिखरों तक पहुँचने का प्रयास नहीं करतीं —
वे तो अनायास ही सागर की गहराई की ओर खिंची चली जाती हैं, जो चुपचाप उन्हें अपनाने के लिए बाहें फैलाए तैयार रहता है।

महान बनने के लिए सागर के समान शांत, विशाल और विनम्र एवं हर एक का स्वागत करते हुए सहज भाव से सबको अपनाने का यत्न करें। 
सच्चा सम्मान प्राप्त करने के लिए स्वयं को दूसरों से निम्न रखने का प्रयास करें।
                                 " राजन सचदेव "

Monday, November 11, 2024

दर्पण के सामने - भगवान कृष्ण

एक बार, भगवान कृष्ण आईने के सामने खड़े थे अपने बालों और पोशाक को ठीक कर रहे थे।
वह अपने सिर पर विभिन्न मुकुटों को सजा कर देख रहे थे और कई सुंदर रत्न-जड़ित गहने पहन कर स्वयं को निहार रहे थे। 
उनका सारथी रथ तैयार करके बाहर इंतजार कर रहा था।

बहुत देर इंतजार करने के बाद सारथी सोचने लगा कि अक्सर कहीं जाना होता है  तो भगवान कृष्ण बहुत जल्दी तैयार हो कर बाहर आ जाते हैं।
लेकिन आज इतना समय बीत जाने के बाद भी वे अभी तक अपने कमरे से बाहर नहीं आए। 
हो सकता है कि उन्होंने बाहर जाने का विचार स्थगित कर दिया हो। 
क्योंकि कृष्ण स्वभाव से ही अप्रत्याशित (Unpredictable) थे और उनके कार्य अक्सर अनपेक्षित (Unexpected) होते थे। 
वो किसी भी समय तत्क्षण ही अप्रत्याशित रुप से कोई निर्णय ले लेते थे। और एक क्षण में ही सब कुछ बदल भी सकता था। 
ऐसा सोच कर वह भगवान कृष्ण के कक्ष में चला गया और देखा कि वह दर्पण के सामने खड़े होकर स्वयं को निहार रहे हैं।

उसने विनम्रता से पूछा, "भगवन, आज आप इतने कीमती कपड़े और आभूषण पहन कर - इतने सज धज कर कहाँ जा रहे हैं?
भगवान कृष्ण ने कहा - आज मैं दुर्योधन से मिलने जा रहा हूं।
आश्चर्य चकित सारथी ने पूछा - 
"प्रभु - आश्चर्य  है कि आप दुर्योधन से मिलने के लिए इतने सज धज कर जा रहे हैं? 

भगवान कृष्ण ने कहा: हाँ भद्र  - क्योंकि वह मेरे अंदर नहीं देख सकता।
वह केवल मेरे बाहरी रुप की ही सराहना कर सकता है।
केवल अच्छे कपड़े - हीरे और रत्न जड़ित आभूषण इत्यादि ही उसे प्रभावित कर सकते हैं। 
वो किसी के अंतर्मन और ज्ञान को परखने - और भावनाओं को समझने में असमर्थ है। 
वो तो केवल बाहरी वस्त्र और आभूषण देख कर ही किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करने का आदी है। 
इसलिए उसे प्रभावित करने के लिए ये सब आभूषण पहनना आवश्यक है "

सारथी ने फिर कहा - 
लेकिन प्रभु - आप दुर्योधन के पास क्यों जा रहे हो? 
आपको उसके पास नहीं - बल्कि उसे आपके पास आना चाहिए। 
आप तो जगत के स्वामी हैं। उसकी तुलना आपके साथ नहीं हो सकती। 
मेरे विचार में यह सही नहीं है। आपको उसके पास नहीं जाना चाहिए।"

कृष्ण पीछे मुड़े - सारथी की ओर देख कर मुस्कुराए और बोले -
     "भद्र - अंधेरा कभी प्रकाश के पास नहीं आता। 
          प्रकाश को ही अंधकार के पास जाना पड़ता है।"
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                                    ' राजन सचदेव '

Tuesday, October 22, 2024

मिट्टी की पकड़ मजबूत होती है

                        तजुर्बा कहता है - मिट्टी की पकड़ मजबूत है
                   संग-ए-मरमर पर अक़्सर ही पाँव फिसलते देखे हैं 

मिट्टी - ग़रीबी अर्थात विनम्रता का प्रतीक है 
और संग-ए-मरमर अमीरी - अर्थात वैभव और शान-ओ-शौक़त के दिखावे का प्रतीक है। 
 
अमीरी और वैभव के शान-ओ-शौक़त के दिखावे से समाज में बहुत देर तक प्रतिष्ठा क़ायम नहीं रखी जा सकती। 
दौलत एवं शान-ओ-शौक़त का अभिमान स्वयं के उत्थान में भी बाधा ही साबित होता है।  

दूसरी तरफ - विनम्रता और हलीमी की पकड़ मजबूत होती है - 
जो लोगों के दिलों में घर कर जाती है और हमेशा के लिए मन में बसी रहती है। 
                                           " राजन सचदेव "

Monday, August 26, 2024

शुभ कृष्ण जन्माष्टमी



क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जन्माष्टमी के अवसर पर दी जाने वाली शुभ कामनाओं में अक़्सर मुस्कुराते हुए बाल कृष्ण 
- अर्थात भगवान कृष्ण के बचपन के मुस्कुराते हुए चित्र ही होते हैं जो बचपन की सादगी और चिंतामुक्त भोलेपन को दर्शाते हैं। 
सादगी और भोलापन - निश्छलता एवं निष्कपटता मानव जीवन में मधुरता का संचार करती है। 

मधुरता और मुस्कुराहट के साथ ही हर चित्र में तीन अन्य प्रमुख प्रतीक भी मिलते हैं। 
            मोरपंख - मुरली और माखन 
  



मोरपंख सुंदरता का प्रतीक है 
मुरली संगीत का - प्रेम के संगीत का प्रतीक है।  
और माखन जीवन एवं संसार के सार तत्व का प्रतीक है। 

इन तीन प्रतीकों में मानव जीवन को सुंदर बनाने का रहस्य छुपा है 
ये मानव जीवन को उत्तम बनाने की कला की ओर संकेत देते हैं। 
ये सत्यम शिवम सुंदरम का प्रतीक हैं। 

कृष्ण को मोरपंख अर्थात सुंदरता पसंद है 
हम भी हर वस्तु और हर व्यक्ति में सुंदरता देखने का प्रयत्न करें - नकारात्मकता नहीं बल्कि सकारात्मकता को देखने का प्रयत्न करें। 

कृष्ण की मुरली प्रेम का संगीत है। प्रेम का संदेश है - कि प्रेम ही सबसे बड़ी शक्ति है। 

भगवान कृष्ण मटके में से माखन निकाल निकाल कर खाते हैं - 
हमें भी इस संसार रुपी मटके अथवा अपने जीवन रुपी मटके में से माखन अर्थात सार तत्व अथवा सत्य को जानने एवं अपनाने का प्रयास करना चाहिए। 
हमेशा सत्य की खोज करें - केवल सत्य को ग्रहण करें और हमेशा सत्य पर अडिग रहें।

कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर ये पांच मकार याद रखें - 
मधुरता - मुस्कुराहट - मोरपंख - मुरली और माखन। 
इन पांचों सुंदर प्रतीकों को अपने जीवन में ढालने का प्रयास करते हुए अपने जीवन को आनंदमय बनाने का प्रयत्न करें।  
            शुभ जन्माष्टमी 
                              " राजन सचदेव "




Saturday, June 8, 2024

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म -- कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है

        अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्
        न भुक्तं क्षीयते कर्म जन्म कोटि शतैरपि ।।
                                  शिव पुराण 23 -39 

हर अच्छे और बुरे कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। 
कोई भी कर्म अपना फल प्रदान किए बिना अनंत काल अथवा कोटि जन्मों तक भी नष्ट नहीं होता। 

अर्थात अच्छे अथवा बुरे - जैसे भी कर्म हम करेंगे - उनका फल हमें कभी न कभी भोगना ही पड़ेगा। 
प्रकृति के इस नियम से कोई भी नहीं बच सकता। 

जैसे धरती में बीज डाल दिया जाए तो कलांतर में वह प्रफुल्लित हो कर वृक्ष का रुप धारण कर लेता है -
और समुचित समय आने पर स्वयंमेव ही वृक्षों पर फल और फूल निकल आते हैं। 
उसी प्रकार - जीवन में किये हुए अच्छे और बुरे कर्म भी अपने आप ही - समय आने पर स्वतः ही अपना फल देने के लिए आते रहते हैं। 

आज तक कोई भी प्रकृति के इस नियम से बच नहीं पाया है। 
यहां तक कि गुरु पीर और अवतार भी कर्म के इस बंधन से मुक्त नहीं हो पाए। 
महानपुरुषों, गुरुओं, पीर-पैगम्बरों और अवतारों की जीवन गाथाओं को पढ़ने और देखने से पता चलता है कि वो भी कर्म के इस सिद्धांत से बच नहीं पाए। 

       कर्म गति टारे नहीं टरी 
       मुनि वसिष्ठ से ज्ञानी ध्यानी शोध के लगन धरी 
       भयो बनवास, मरण दसरथ को, बन में बिपति परी 
       सीता को हरि ले गयो  रावण सुवर्ण लंक जरी 
       कहत कबीर सुनो भई साधो होनी हो कै रही  
 
संत कबीर जी कहते हैं कि कर्म की गति टल नहीं सकती। 
ऋषि वशिष्ठ जैसे महान ज्ञानी ध्यानी मुनि ने सोच समझ कर भगवान राम के राज्य अभिषेक का मुहूर्त निकाला 
- लेकिन उसी मुहूर्त में भगवान राम को राजतिलक के स्थान पर बनवास मिल गया 
 इस दुःख के कारण ही पिता दशरथ की मृत्यु हो गई 
- भगवान राम को वन में कई विपत्तियों का सामना करना पड़ा 
- रावण ने माता सीता का अपहरण कर लिया। 
महान विद्वान ज्ञानी और पंडित होते हुए भी अपने कर्मों के कारण रावण का सर्वनाश हो गया और उसकी स्वर्ण-लंका भी जल कर राख  हो गई। 
कबीर जी महाराज फ़रमाते हैं कि होनी तो हो कर ही रहती है।  

अर्थात हर किसी को अपने कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है 
क्योंकि कोई भी कर्म अपना फल प्रदान किए बिना नष्ट नहीं होता। 
                       " राजन सचदेव "

नोट :
विभिन्न शास्त्रों में उपरोक्त श्लोक के कुछ विभिन्न रुप भी मिलते हैं :

कृतकर्मक्षयो नास्ति कल्पकोटिशतैरपि ।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥ ३९ ॥
              शिव पुराण 

ननुनाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥ 
          -- ब्रह्मवैवर्तपुराण १/४४/७४

यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमाप्नुयात् ।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ।।
                        देवीभागवत ०६/०९/६७

Thursday, May 30, 2024

मन पंछी तब लग उड़ै

मन पंछी तब लग उड़ै विषय वासना माहिं।
ज्ञान बाज की झपट में जब लगि आवै नाहिं ।। 
                                 कबीर वाणी

सद्गुरु कबीर जी कहते हैं कि मन रुपी पक्षी विषय वासनाओं के आकाश में तभी तक उड़ता है जब तक ज्ञान रुपी बाज़ की पकड़ में नहीं आता। 
जिस तरह एक बाज़ किसी छोटी सी चिड़िया को झपट कर अपनी लपेट में ले लेता है उसी तरह जो मन ज्ञान की लपेट आ जाए वह संसार की वासनाओं में नहीं भटकता। 

Friday, May 24, 2024

सीमा

गलियों, सड़कों और हाईवे पर वाहन चालन की गति सीमा निर्धारित होती है। 
बैंक एवं ए-टी-एम में पैसे जमा करवाने अथवा निकलवाने की सीमा निर्धारित होती है। 
स्कूलों और कॉलेजों में हर कक्षा में पढ़ने और पढ़ाने के लिए समय निर्धारित होता है। 
परीक्षाओं में भी यथोचित उत्तर देने के लिए समय की सीमा निर्धारित होती है। 

लेकिन सोच और विचार की कोई सीमा निर्धारित नहीं है। 
मन की सोच-विचार का दायरा असीमित है। 
सोच चाहे अच्छी हो या बुरी - विचार शुद्ध एवं पवित्र हों या अपवित्र - 
भावनाएं चाहे दूसरों के हित की - सब का भला करने की हों या उनके अहित की - उन्हें कष्ट पहुँचाने की -
इन सब के लिए कोई सीमा निर्धारित नहीं है। 

इन्सान चाहे तो अपने विचारों के ज़रिए खुले आकाश में परवाज़ कर सकता है - 
ऊँची  से ऊँची उड़ान भर सकता है - या फिर पाताल से भी नीचे गिर सकता है। 
इसके लिए प्रकृति की ओर से कोई रुकावट - कोई सीमा निर्धारित नहीं है। 
ये हम पर निर्भर करता है कि हम किस और बढ़ना चाहते हैं 
यदि अपने वर्तमान स्तर से ऊपर उठना चाहते हैं तो अपनी सोच - अपने विचारों को श्रेष्ठ एवं उत्तम बनाने का प्रयास करें। 
शुभ सोचें - शुभ बोलें - शुभ करें - 
      तो बदले  में भी शुभ ही पाएंगे।  
                                                  " राजन सचदेव "

Friday, June 30, 2023

माया महा ठगनी हम जानी

माया महा ठगनी हम जानी।।
तिरगुन फांस लिए कर डोले बोले माधुरी बानी।।

केशव की कमला बन बैठी शिव के भवन भवानी।।
पंडा के मूरत बन बैठी तीरथ में भई पानी।।

योगी के योगन बन बैठी राजा के घर रानी।।
काहू के हीरा बन बैठी काहु के कौड़ी कानी।।

भगतन की भगतिन बन बैठी बृह्मा की बृह्माणी।।
कहे कबीर सुनो भई साधो यह सब अकथ कहानी।।
                                 " सद्गुरु कबीर जी "
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सद्गुरु कबीर जी फरमाते हैं कि -
ये माया मनुष्य तो क्या - विष्णु को ठगने के लिए लक्ष्मी
और शिव को ठगने के लिए भवानी बन जाती है।
ब्रह्मा को ठगने के लिए ब्रह्माणी बन जाती है।
एक सेठ हीरे-मोतियों के मोह में बंधा है
तो ग़रीब भी अपने दो पैसों का मोह भला कहां छोड़ सकता है?
भक्तों के मन में भी कुछ न कुछ पाने की लालसा बनी ही रहती है
ये एक अकथ कहानी है - किस किस का नाम लें - हर प्राणी माया के बंधन में बंधा है।
संत कबीर जी के कथन अनुसार - कोई भी प्राणी जो शरीरधारी है - चाहे वह ब्रह्मा विष्णु महेश ही क्यों न हों -
किसी न किसी रुप में माया के अधीन हो ही जाते हैं।
                                      " राजन सचदेव "

Sunday, May 7, 2023

धन क्या खरीद सकता है और क्या नहीं

      धन से  क्या खरीदा जा सकता है और क्या नहीं

धन से बिस्तर खरीदा जा सकता है - पर नींद नहीं
घड़ी खरीदी जा सकती है  - पर समय नहीं
किताब खरीदी जा सकती है  - पर ज्ञान नहीं
पेंटिंग खरीदी जा सकती है  - पर प्रतिभा नहीं  
वाद्य यंत्र खरीदा जा सकता है - पर कला नहीं
पद खरीदा जा सकता है - पर सम्मान नहीं
मकान खरीदा जा सकता है - पर घर नहीं
दवा खरीदी जा सकती है - पर स्वास्थ्य नहीं
मनोरंजन खरीदा जा सकता है - पर खुशी नहीं
जान-पहचान खरीदी जा सकती है  - पर सच्ची मित्रता नहीं
आज्ञाकारिता खरीदी जा सकती है - पर विश्वास और वफ़ादारी नहीं
विलासिता तो खरीदी जा सकती है  - पर शांति नहीं

गणेश विसर्जन - एक गहरा दार्शनिक महोत्स्व

इन दिनों महाराष्ट्र (भारत) में गणेश विसर्जन का त्योहार मनाया जा रहा है। गणेश चतुर्थी के दौरान, भगवान गणेश की सुंदर मूर्तियाँ बना कर स्थापित ...