Thursday, December 17, 2015

लोग मिलते - और बिछड़ते रहे

लोग मिलते - और बिछड़ते रहे 
उमर भर ये सिलसिला चलता रहा

कभी सबरो-शुकर का आलम रहा 

और कभी शिकवा गिला चलता रहा  

मिल सके न कभी किनारे दरिया के 

दरमियाँ का फ़ासला चलता रहा 

जिस्म का हर अंग साथ छोड़ गया 

साँसों का पर काफ़िला चलता रहा 

कौन रुकता है किसी के वास्ते 

मैं गिरा- तो काफ़िला चलता रहा 

मंज़िल वो पा लेता है 'राजन' कि जो 

रख के दिल में हौसला चलता रहा 

                     'राजन सचदेव' 

                                  16 दिसंबर  2015 
नोट :
ये चंद शेर अचानक मेरे ज़हन में उस वक़्त उतरे जब मैं श्री रमेश नय्यर जी को hospice में देख कर वापिस आ रहा था।  नय्यर जी और उनके परिवार से मेरा संबन्ध तब से है जब वो पठानकोट में रहते थे और मै जम्मू में।





5 comments:

  1. Very well said our dear Rajan Sachdeva Jee . Urs. Premjit Singh

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  2. Thanks. Good thought.
    Regards
    Harvinder

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  3. How true! We have to keep going no matter what. Thanks.

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  4. भाई साहिव जी वहुत बडिया

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