Sunday, December 6, 2015

क़तरा हूँ समंदर के लहजे में बात करता हूँ


क़तरा हूँ - समंदर के लहजे में बात करता हूँ
​ख़ुदाया रहम कर, मैं बदग़ुमाँ होने से डरता हूँ 

बखूबी जानता हूँ यूँ तो सब कमज़ोरियाँ अपनी
मगर ये क्या, कि फिर पाकीज़गी का दम भी भरता हूँ

यूँ  तो  जाने पहचाने  ही  हैं  ये  रास्ते  मेरे 
मगर हर बार उसी मुक़ाम पर आ कर फिसलता हूँ  

मुझे मालूम है   दुनिया तो माटी का खिलौना है 
मगर फिर भी इसे पाने की ख़ातिर क्यों मचलता हूँ 

ये मेरी बदनसीबी है   या बे परवाई है 'राजन '
(कि) जो न चाहिए करना वही मैं कर गुज़रता हूँ 

               " राजन सचदेव "




3 comments:

  1. Hello Rajanji:

    Your words are so inspiring that I have printed all your material and will read until some of these lines become a part of my daily life. Thank you so much for your kindness and thoughtfulness. prem​

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  2. Thank you Rajan Ji. Feels like you wrote it for me.

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  3. यह पंक्तिया " बखूबी जानता हूँ यूँ तो सब कमज़ोरियाँ अपनी
    मगर ये क्या, कि फिर पाकीज़गी का दम भी भरता हूँ " यही कमजोरी जो छुपाए रहता हुं मैं

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