एक मैं ही समझदार हूँ बाकी सब नादान
इसी वहम में घूम रहा है देखो हर इंसान
Ek main hee samajh-daar hoon baaki sub nadaan
Isi veham me ghoom rahaa hai dekho har insaan
अमीर ने जो पकड़ी है कितनी ख़ूबसूरत लकड़ी है पर उस पर जो नक़्क़ाशी है वो इक ग़रीब ने तराशी है अमीर के लिए ये सोटी है पर ग़रीब की ये रोटी है ...
No comments:
Post a Comment