Thursday, April 23, 2015

पुष्प या पत्थर ?

एक मंदिर में स्थापित प्रस्तर प्रतिमा पर चढ़ाए गए पुष्प ने क्रोधित होकर पुजारी से कहा,
"तुम प्रतिदिन इस प्रस्तर प्रतिमा पर मुझे चढ़ाकर इस
​ पत्थर ​की पूजा करते हो। यह मुझे कतई पसंद नहीं है। पूजा मेरी होनी चाहिये क्योंकि मैं 
सुंदर, कोमल और ​सुवासित​-​​सुगन्धित ​हूँ। यह तो मात्र पत्थर की​ निर्जीव ​मूर्ति है।

मंदिर के पुजारी ने हँसते हुए कहा​ ....
 ​
हे पुष्प, तुम कोमल, सुंदर​ तथा ​सुवासित अवश्य हो पर तुम्हें ईश्वर ने ​ही ​ऐसा बनाया है। ये गुण तुम्हें सहजता से प्राप्त हुए हैं। इनके लिये तुम्हें कोई श्रम नहीं करना पड़ा है पर देवत्व प्राप्त करना बड़ा कठिन काम है। इस देव प्रतिमा का निर्माण बड़ी कठिनाई से किया जाता है। एक कठोर पत्थर को देव प्रतिमा बनने के लिये हजारों चोटें सहनी पड़ती है। चोट लगते ही अगर यह टूट कर बिखर जाता तो शायद यह कभी देव प्रतिमा नहीं बन सकता था। एक बार कठोर पत्थर देव प्रतिमा में ढल जाए तो लोग उसे बड़े आदर भाव से मंदिर में स्थापित कर प्रतिदिन उसकी पूजा अर्चना करते हैं। इस प्रस्तर​ (पत्थर)​ की सहनशीलता ने ही इसे देव प्रतिमा के रूप में पूजनीय तथा वंदनीय बना दिया है।यह सुनकर पुष्प मुस्कुरा दिया। वह समझ गया कि सहनशीलता की कठिन परीक्षा को सफलता पूर्वक पार करनेवाला ही देवत्व प्राप्त करता है।




No comments:

Post a Comment

सहर जब आई Sehar Jab Aayi

सहर जब आई तो लाई उसी चिराग़ की मौत  जो सारी रात तड़पता रहा सहर के लिए  Sehar jab aayi to laayi usi chiraagh ki maut  Jo saari raat tada...