Friday, October 9, 2020

भय सों भक्ति करै सब कोय

सतगुरु कबीर जी कहते हैं:
    "भय सों भक्ति करै सब कोय - निर्भय भजै नहीं कोय"
अर्थात: हर व्यक्ति (अधिकतर लोग) किसी न किसी भय के कारण ईश्वर की उपासना करते हैं 
कोई नुक्सान हो जाने या दंड मिलने के भय से - या मृत्यु, अथवा अज्ञात के भय से।
(आम तौर पर) कोई भी बिना किसी भय के ईश्वर की उपासना या प्रभु से प्रेम नहीं करता।

भगवान कृष्ण कहते हैं कि योगी अथवा ब्रह्म ज्ञानी ऋषियों एवं संतों के मुख्य गुणों में से एक गुण है निर्भयता
                            प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः
निर्मल, निर्भय, ज्ञान में दृढ़, प्रतिबद्ध - अनुशासित और संतुलित मन……
                                (भगवद गीता ~ अध्याय ६ - श्लोक: १४)
प्राचीन हिंदू धर्म ग्रंथ ऐसी कई कहानियों से भरे हुए हैं, जब भगवान ने ऋषियों और भक्तों की भक्ति से प्रसन्न हो कर उन्हें अभय दान या 'अभीह ' (भय से मुक्त होने का वरदान) दिया।
भक्ति का अंतिम चरण अथवा परिणाम है 'मोक्ष - जिसका अर्थ है मुक्ति - स्वतंत्रता - हर प्रकार के भय से मुक्ति।

इसी तरह, गुरुबानी भी कहती है:
                       भय काहू को देत नहीं, न भय मानत आन
                       कहु नानक सुन रे मना ज्ञानी ताहि बखान (म: 9)


"जो न किसी को भय देता है और न ही किसी अन्य का भय मानता है
अर्थात जो न किसी से डरता है और न ही किसी और को डराता है

नानक कहते हैं, कि हे मन - उसे ज्ञानी समझो - उसे ही ज्ञानी कहा जाता है - अर्थात वही आध्यात्मिक रुप से प्रबुद्ध एवं ग्यानी है । "
                                                     (9 वें गुरु - तेग बहादुर जी)
तथा:
                       " निर्भय भए सगल भय खोए गोबिंद चरण ओटाई"
                                                (महला -5 पृष्ठ 1000)
जो सर्वशक्तिमान की शरण लेता है वह निर्भय हो जाता है - उसके सारे भय मिट जाते हैं।

ईश्वर से डरने की ज़रुरत नहीं है।
भय या लालच से की गई भक्ति वास्तविक भक्ति नहीं है।

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने भी इसे बड़ी खूबसूरती से कहा: -

चित्त जेथा भयशून्य - उच्च जेथा शिर - ज्ञान जेथा मुक्त
जेथा गृहेर प्राचीर आपन प्रांगणतले दिवस-शर्वरी वसुधारे राखे नाइ थण्ड क्षूद्र करि​  ​
जेथा वाक्य हृदयेर उतसमूख हते उच्छसिया उठे जेथा निर्वारित स्रोते,
​​देशे देशे दिशे दिशे कर्मधारा धाय अजस्र सहस्रविध चरितार्थाय।
​जेथा ​तुच्छ ​ आचारेर ​मरु ​-वालू-राशि विचारेर स्रोतपथ फेले नाइ ग्रासि-
पौरुषेरे करेनि शतधा नित्य जेथा तूमि सर्व कर्म चिंता-आनंदेर नेता।"


अर्थात:
जहां मन भयशून्य - अर्थात बिना किसी भय के हो
और जहां सिर ऊंचा हो (स्वाभिमान से) 
जहां ज्ञान मुक्त हो (गलत धारणाओं और अंध विशवास से मुक्त)
जहां संसार दिन रात स्वार्थ की क्षुद्र दीवारों से टुकड़ों टुकड़ों में न बांटा जाता हो
जहां सत्य की गहराई से शब्द निकलते हों - जहाँ हर वाक्य हृदय की गहराई से निकलता हो
जहां अथक प्रयास से पूर्णता की ओर आगे बढ़ते हों
जहां विचारों की सरिता तुच्‍छ आचारों की मरु भूमि में न खो जाए -
जहां तर्क (Reasoning) एवं विवेक बुद्धि (Wisdom) की स्पष्ट धारा अंधविश्वास के मरुस्थल में अपना रास्ता न खो दे।
जहां आपकी कृपा से हम बुद्धि - विवेक और कर्म के क्षेत्र में आगे बढ़ते रहें 
जहां पर सभी कर्म, भावनाएं, आनंदानुभुतियाँ तुम्‍हारे अनुगत हों
हे परम पिता परमात्मा - मेरे सोए हुए देश को ऐसी स्वतंत्रता के स्वर्ग में जगा दो।
                                    ' रवीन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) '
इसलिए:
                               निर्भय होइ भजहु भगवाना ’(गुरबानी)
निर्भय होकर ईश्वर की उपासना करें,
भय से नहीं बल्कि प्रेम के कारण -
विशुद्ध निःस्वार्थ प्रेम के साथ
                            ' राजन सचदेव '

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