धन निरंकार संत जी,
आप हमेशा मौत के बारे में ही क्यों लिखते हैं ? जीवन के बारे में क्यों नहीं लिखते ?
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पहली बात -
मेरे अधिकतर लेख तो जीवन के बारे में ही होते हैं - लेकिन क्योंकि उनमें से अधिकांश English में होते हैं
इसलिए शायद वह हिंदी और पंजाबी पाठकों तक नहीं पहुंच पाते।
और दूसरी बात यह है कि मौत एक अपरिहार्य तथ्य - एक अटल सच्चाई है जिसे नकारा नहीं जा सकता।
इसीलिए सभी धर्म ग्रंथों ने मृत्यु को हमेशा याद रखने पर ज़ोर दिया है।
भगवान कृष्ण ने भगवद गीता के आरम्भ में ही अर्जुन को यह बात समझाने का प्रयास किया
जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु (2 -27)
अर्थात जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है।
बस इसी तरह मौत से डरने की ज़रुरत नहीं।
मैंने इसीलिए तुम्हें यहाँ बुलाया है कि मेरे इस नए सफ़र की तैयारी में मेरी सहायता करो और किसी डर - भय के बिना मुझे विदा करो।
सर पर एत्थे आवणा मौतों क्या डरआओ
