मन एक बगीचा है और विचार बीज हैं।
चाहें तो हम इसमें फूल उगा सकते हैं या घास-फूस, झाड़ और झाँखड़।
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मन एक बगीचे की तरह है।
हम इसमें जो कुछ भी बोते हैं - आशाएं, श्रद्धा, विश्वास, या भय - अंततः वही उगते और प्रफुल्लित होते हैं।
अगर हम दया, श्रद्धा, विश्वास और कृतज्ञता के विचार बोएंगे तो वे आगे चलकर संतोष और आनंद के रुप में खिलेंगे और कठिन समय में हमें साहस और शक्ति प्रदान करेंगे।
लेकिन अगर हम लगातार क्रोध, ईर्ष्या, जलन, नाराज़गी और भय के बीज बोएंगे, तो वे भी हमारे मन में जड़ें जमा लेंगे और अंततः हमारा जीवन भी उसी तरह ढल जाएगा।
ध्यान रहे कि बगीचा अपने-आप सुंदर नहीं बनता।
उस पर ध्यान देना पड़ता है।
लगातार देखभाल करनी पड़ती है और नियमित रुप से झाड़-झंखड़ इत्यादि हटाने की ज़रुरत पड़ती है।
मन के साथ भी ऐसा ही है।
हमें उन विचारों के प्रति सतर्क रहना चाहिए जिन्हें हम पालते-पोसते हैं - जिन्हें अपने मन में जड़ें जमाने देते हैं।
अगर वो जड़ें गहरी हो जाएं तो उन्हें हटाना मुश्किल हो जाता है।
इसलिए मन पर नियंत्रण रखें।
इसे सकारात्मक विचारों से सींचें।
इसे ज्ञान एवं विवेक से पोषित करें।
ताकि हमारा जीवन एक ऐसा बगीचा बन जाए जो शांति और सुकून को दर्शाए।
" राजन सचदेव "
🙏🙏🙏😇😇😇
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