सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती।
जीवन में हमेशा कुछ न कुछ नया सीखने अथवा खोजने के लिए होता ही है—
क्योंकि बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम अभी भी नहीं जानते।
इसलिए एक बुद्धिमान और समझदार इंसान स्वयं को एक विद्यार्थी मानता है।
वह सदैव हर क्षण, हर परिस्थिति में एवं हर व्यक्ति से कुछ न कुछ सीखने के लिए तत्पर रहता है।
जितना वह सीखता है, जानता और समझता है - उतना ही उसे एहसास होता है कि अभी तो और कितना कुछ अज्ञात है - जो जानना और समझना बाकी है।
इसी कारण सच्चे ज्ञानी हमेशा विनम्र रहते हैं।
वे अपने ज्ञान, आध्यात्मिक जागरुकता और भक्ति का कभी अभिमान नहीं करते।
वे ज्ञान के कारण स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ नहीं मानते।
बल्कि वे तो हमेशा प्रभु की कृपा मांगते हैं और जाने अनजाने में की हुई भूलों के लिए क्षमा याचना करते हुए सदैव ये प्रार्थना करते हैं —
“तू ही निरंकार – मैं तेरी शरण – मैनूं बख्श लो।”
(केवल एक आप ही सर्वशक्तिमान एवं निराकार प्रभु हैं — मैं आपकी शरण में हूँ — मैंने जो भी जाने या अनजाने में किया हो, उसके लिए मुझे क्षमा करें)
जैसा कि सतगुरु कबीर जी महाराज भी कहते हैं:—
“कबीर गर्व न कीजिए – रंक न हसिए कोय,
अजहूँ नाव समुंद में, क्या जाना क्या होय।”
अर्थात—
गर्व मत करो - किसी गरीब, दुर्बल और अन्य किसी का भी उपहास मत करो।
अभी तो तुम्हारी अपनी नाव भी समुद्र के बीच में है, तो तुम अपने पार होने का दावा कैसे कर सकते हो? कौन जानता है कि यात्रा के समाप्त होने से पहले क्या हो जाए?
इसलिए अपने मार्ग पर ध्यान दें।
विनम्रता में रहें।
और निरंतर सीखने की भावना रखें।
दूसरों को तुच्छ समझ कर उनकी आलोचना अथवा उपहास कर के उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास न करें।
बिना किसी पूर्वाग्रह और बिना किसी भेदभाव के अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहें।
" राजन सचदेव "
.Bahut hee Uttam aur Shikshadayak bachan ji .🙏
ReplyDeleteSatya hai ji jahan seekhna ruk gya intellect b vahi fullstop ho jata hai ji🙏🌹
ReplyDeleteBahut hi uttam bachan ❤️🙏
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