जंगल जंगल ढूँढ रहा है मृग अपनी कस्तूरी पल पल बढ़ती जाती है यूं स्वयं से उसकी दूरी सत्गुरु कबीर जी महाराज फरमाते हैं : कस्तूरी कुंडल ...
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