Tuesday, April 9, 2013

भगवान् कृष्ण और पिशाच


                                                  भगवान् कृष्ण और पिशाच


एक बार भगवान श्री कृष्ण, बड़े भाई बलदेव एवं मित्र सात्यकि रात्रि के समय रास्ता भटक गये !
सघन वन था ! निर्णय हुआ कि वहीं रात्रि में विश्राम किया जाय ! ये तय हुआ कि तीनो बारी-बारी जाग कर पहरा देंगे !
सबसे पहले सात्यकि जागे बाकी दोनो सो गये ! कुछ देर के बाद एक पिशाच पेड़ से उतरा और सात्यकि को युद्ध के लिए ललकारने लगा !पिशाच की ललकार सुन कर सात्यकि अत्यंत क्रोधित हो गये ! दोनो में युद्ध होने लगा ! जैसे -जैसे पिशाच क्रोध करता सात्यकि दुगने क्रोध से लड़ने लगते ! सात्यकि जितना अधिक क्रोध करते उतना ही पिशाच का आकार बढ़ता जाता ! युद्ध में सात्यकि को बहुत चोटें आईं ! वो धरती पर गिर गए और पिशाच चला गया !
एक प्रहर बीत गया अब बलदेव दाऊ जागे ! सात्यकि ने उन्हें कुछ न बताया और सो गये ! बलदेव को भी पिशाच की ललकार सुनाई दी, और वह क्रोध-पूर्वक पिशाच से भिड़ गये ! जितना वो क्रोध करते, पिशाच का आकार उतना ही बढ़ जाता ! लड़ते हुए एक प्रहर बीत गया उनका भी सात्यकि जैसा हाल हुआ !
अब श्री कृष्ण के जागने की बारी थी ! दाऊ बलदेव ने भी उन्हें कुछ न बताया और सो गये ! श्री कृष्ण के सामने भी पिशाच की चुनौती आई ! पिशाच जितने अधिक क्रोध से  श्री कृष्ण को ललकारता  श्री कृष्ण उतने ही शांत-भाव से मुस्करा देते ; और पिशाच का आकार घट जाता ! अंत में वह एक चींटी जितना रह गया जिसे श्री कृष्ण ने अपने पटुके के छोर में बांध लिया !
प्रात:काल सात्यकि व बलदेव ने अपनी दुर्गति की कहानी श्री कृष्ण को सुनाई तो श्री कृष्ण ने मुस्करा कर उस कीड़े को दिखाते हुए कहा -यही है वह क्रोध-रूपी पिशाच ! जितना तुम क्रोध करते थे इसका आकार उतना ही बढ़ जाता था ! परन्तु  जब मैंने इसके क्रोध का जवाब क्रोध से न देकर , शांत-भाव से दिया तो यह हतोत्साहित हो कर दुर्बल और छोटा होता गया ! 


 अतः क्रोध पर विजय पाने के लिये क्रोध से नहीं, बल्कि संयम से काम लें तो क्रोध स्वयम ही समाप्त हो जाएगा !


 

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