Saturday, March 27, 2021

वयम अमृतस्य पुत्रः

                        वयम अमृतस्य पुत्रः  
                          (श्वेताश्वर उपनिषद)

हम अमृत - अर्थात अमर, सर्वव्यापी, सर्वगुणसम्पन्न सर्वोच्च ईश्वर की संतान हैं।

वेदों के अनुसार, दिव्य ईश्वर ही सब का स्रोत है।
सारा ब्रह्मांड परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है।

बाइबल भी कहती है कि 'ईश्वर ने मनुष्य को अपनी छवि में - यानि अपने जैसा बनाया'।
चूँकि ईश्वर दिव्य एवं पवित्र है - इसलिए उसकी छवि भी पवित्र ही होनी चाहिए।
इसका अर्थ हुआ कि सभी दिव्य हैं - Divine हैं - पवित्र हैं - सब में divinity अर्थात दिव्यता एवं पवित्रता मौजूद है। 
इसलिए सब की दिव्यता को स्वीकार करके सभी का सम्मान किया जाना चाहिए।

लेकिन अक्सर हम हर प्राणी में दिव्यता - Divinity  और पवित्रता को पहचानने और स्वीकार करने में असफल रह जाते हैं और सोचते हैं कि हमें भेदभाव करने का अधिकार है - 
हमें यह तय करने का अधिकार है कि कौन पवित्र है और कौन नहीं। 

दूसरों का विश्लेषण करने - उन्हें जांचने और परखने की बजाय, हमें अपने भीतर देवत्व के स्रोत को खोजने की कोशिश करनी चाहिए और अपने स्वत्व को प्रज्वल्लित करने - और बाहरी, भौतिक जीवन में उसे व्यवहारिक रुप देने का प्रयास करना चाहिए।  
साथ ही अन्य सभी व्यक्तियों में मौजूद देवत्व को भी स्वीकार करते हुए सभी का सम्मान करना चाहिए।
                                             ' राजन सचदेव '

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