جو آنسو پھیل کر دریا ہوا ہے
ہماری آنکھ سے ٹپکا ہوا ہے
مقدّر میں لکھا تھا جو نہ میرے
وو دانا دانت میں اٹکا ہوا ہے
( شاعر - نامعلوم )
जंगल जंगल ढूँढ रहा है मृग अपनी कस्तूरी पल पल बढ़ती जाती है यूं स्वयं से उसकी दूरी सत्गुरु कबीर जी महाराज फरमाते हैं : कस्तूरी कुंडल ...
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