Sunday, July 31, 2022

A lamp is not bound to a place - Chiraagh ka apnaa makaan nahin hota

Jahaan rahega vahin raushni lutaayega
Kisi chiraagh ka apnaa makaan nahin hota 
                                " Wasim Barelavi "
                         ~~~~~~~~~~~~~~
A candle or a lamp is not bound to a specific place
nor its light is confined to a particular home. 
It's the nature of the lamp that wherever it goes, 
it spreads the light and illuminates the place.

किसी चिराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

  जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा 
किसी चिराग़ का अपना मकाँ नहीं होता                         
                                वसीम बरेलवी

 जलता हुआ दीपक किसी एक विशेष स्थान से बंधा हुआ नहीं होता 
न ही इसकी रोशनी किसी ख़ास घर के लिए होती है और वहीं तक ही सीमित रहती है।
दीपक का स्वभाव है कि वह जहां भी रहता है वहां प्रकाश ही फैलाता है 
और उस स्थान को रोशन कर देता है।

Saturday, July 30, 2022

मधुर संस्मरण - आदरणीय भूपिंदर दिलवर जी मुंबई

आदरणीय भूपिंदर सिंह चुघ 'दिलवर' जी मुंबई - मधुर संस्मरण और अंतिम शब्द

आदरणीय भूपेंद्र दिलवर जी ने आज ही के दिन ठीक एक साल पहले (30 जुलाई 2021 को) अपनी शारीरिक यात्रा पूर्ण की! भले ही इस बात को एक वर्ष हो चुका है, लेकिन उनकी यादें - उनके संस्मरण हमें आज भी प्रेरणा दे रहे है और मुझे विश्वास है कि इस लेख के कुछ उदाहरण मुझे और मेरे जैसे अनेकों के लिए एक मापक सिद्ध होंगे। 

प्रस्तुत है, ऐसे ही कुछ प्रेरक प्रसंग...

यह बात आ. दिलवर जी के जीवन के अंतिम दौर की है! दिलवर जी बिमारी में अपने बिस्तर पर लेटे हुए ही अपने दिन व्यतीत कर रहे थे! शरीर में काफी थकावट आ गई थी, इस कारण उनकी देख-रेख करने के लिये परिवार के अलावा, मेल नर्स (सहायक) उनके साथ चोबिसों घंटे के लिये उपलब्ध थे। 

रात का समय हो गया था, सब सो चुंके थे! इतने मे आ. दिलवर जी की नींद खुली और वह बिस्तर से उठकर कुछ लेना चाहते थे! वो अपने सहायक को आवाज देने ही वाले थे कि उन्होंने देखा कि वह सहायक भी दिन भर की थकावट के बाद गहरी नींद मे हैं, यह देख कर दिलवर जी ने उन्हें आवाज तक नही लगाई और खुद ही वह वस्तु प्राप्त करने के लिये बिस्तरसे उतर कर खुद ही चलने की कोशीश करने लगे और उस असफल प्रयास मे वह गिर गये, जिसकी वजह से उनका हाथ फॅक्टचर हुआ और अंत समय तक वैसे ही रहा।

जरा सोचिये, वह सहायक (मेल नर्स) जो अभी कुछ ही दिनोंसे उनके  साथ जुडे थे, ज्यादा जान-पहचान भी नही थी,  उस सहायक को उस कार्य को करने की सैलरी भी मिलती थी, किंतु ऐसी स्थिति में भी दिलवर जी ने अपनी सेहत का ख्याल न करते हुए, उस सहायक के आराम के बारे मे सोचा।

कितना ऊँचा दया भाव, कितनी ऊँची मानवता उनके अंदर थी और वह तब भी बरकारार थी, जब उनका शरीर अशक्त था..

दिलवर जी दयाभाव के साथ-साथ काफी प्रॅक्टिकल भी थे, 
उदाहरण के तौर पर एक घटना याद आई !

जब उनके पास मुंबई मे कोई सज्जन सेवा के भाव से अभिभूत  हो कर आये, अति उत्साह मे दिलवर जी से कहने लगे,  "दिलवर जी, मैने सुना है, पुरातन संतो ने अपने जॉब की, व्यवसाय की कोई परवाह नहीं की और सबसे पहले भक्ति और  सेवा की! आज मैं भी अपनी जॉब छोड़कर आया हूं केवल इसलिए कि अब मैं भी पूरी सेवा निभाउंगा, अपना जीवन मिशन के, आध्यात्मिकता के नाम लगाऊंगा..."

दिलवर जी ने जब यह बात सुनी तो बिल्कुल स्पष्ट और ऊंचे स्वर में उनसे कहने लगे:-
"महात्मा, मुझे आप बताइए, क्या आप किसी पुरातन महात्मा की किसी क्रिया का बिना जाने पहचाने, अंधानुकरण (blindly follow) करना चाह रहे है ?" नही ना... क्या आपको उस समय की परिस्थितियों का कुछ अंदाजा भी है?

और ज़रा गहराई से सोचिये, सद्गुरु ने हमे चौथा प्रण क्यों दिया? क्या आप जिम्मेदारियो का निर्वाह नही करना चाहते?

 सद्गुरु हम से प्रैक्टिकल आध्यात्मिकता की अपेक्षा करते है...

जाओ, जा कर कोई और जॉब ढूंढो..औऱ याद रक्खो कि अपना जॉब या व्यापार छोड़कर कोई सेवा नही होती...

आ. दिलवरजी ने कभी भी किसी मंच से यह नही कहाँ की आपके पास जितने पैसे है, दान कर दो! उन्होंने कभी किसी को कोई सेवा करने के लिए जोर-जबरदस्ती नही की। हां लेकिन खुद सेवा करके सबको प्रेरित किया, और सेवा भी ऐसे करी, कि अपनी पत्नी को भी उसका अंदाजा नही लगने दिया। उन्होंने सेवा करते समय भी मध्यमार्ग को अपना कर जिम्मेदारी के साथ तन-मन-धन की सेवा करने के लिए प्रेरित किया।

अगर भवन पर कोई मीटिंग हो ती, तो मुझे अक्सर कहते की जब मेरे आफिस का कार्य पूरा हो जाये तब ही आना, अन्यथा जब छुट्टी होती है, तब अवश्य ही समय से पहले आकर सेवा करना। परिवार को साथ ले आना, तांकि परिवार के साथ भी समय गुज़र सके और बिना किसी और चिंता के दुगने उत्साह में सेवा करते रहें।

 दिलवर जी ने प्रक्टिकलिटी (PRACTICALITY) और भावनाओं का अद्भुत संतुलन बनाया हुआ था। जब मुझे उनकी बीमारी के बारे में पता चला तो दिसंबर 2020 में कोरोना के दौर में भी मुझसे रहा नहीं गया और मैं उनसे मिलने के लिए उनके घर चला गया। 
बीमारी के बारे में पता होते हुए भी उन्होंने मुझसे बीमारी के बारे में कोई बात नही की! इसके विपरीत, वह आनेवाले समागम की सेवाओ की सुचारुता औऱ विभिन्न तैयारियों का ही ज़िक्र कर रहे थे, जब कुछ देर बैठ कर वह थक गए तो कहने लगे कि मैं लेट जाता हूं, लेकिन लेट कर भी मुझे तुमसे सेवा के बारे में बातें करनी है, तुम रुक जाओ। ऐसी परिस्थितिमें भी उनका जज़्बा अपनी चरम सीमा पर था।

कुछ दिनों बाद जब उनकी हालत ज्यादा बिगड़ी, तो उन्हें वेंटिलेटर लगाना पड़ा, उन्होंने ज़िन्दगी जीने की, तबीयत में सुधार लाने की पूरी कोशिश की, हर सम्भव उपचार पद्धति भी उन्होंने परिवारजनों की मदद से अपनाई।
किन्तु जब उन्हें अंदर से अहसास हो गया, कि मेरे बिस्तर पर पड़े रहने से न केवल मुझे बल्कि अन्य सभी को तकलीफ हो रही है तो उन्होंने 24 जुलाई 2021 को एक संदेश भिजवाया, वह सन्देश जो का त्यों आपके समक्ष सादर प्रस्तुत है:

Dhan Nirankar ji
Please ask saints to stop praying for me to get well it may delay things. 
Please all of you pray to Nirankar to end my suffering and pain specially from breathlessness even if it means merging in Nirankar.
Full family is prepared.
Datar mehar karo pain and suffering end kar do thank you ji. 
🙏🏻
Dilvar

यह उनके अंतिम शब्द थे, यह उनका अंतिम मैसेज था...
ऐसा संदेश उनके व्हाट्सएप द्वारा मिलते ही, मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई, बुद्धि जैसे कुंठित हो गई। 

फिर दूसरे  ही दिन से, उनकी तबीयत और भी बिगड़ी औऱ एक हफ्ते से भी कम समय में वह 30 जुलाई को सूर्य उगने से पूर्व ही अपना शरीर त्याग कर परम सत्ता में विलीन हो गए...

उनके आखरी शब्द औऱ आख़री प्रार्थना भी निरंकार सद्गुरु ने मान ली, जैसे उन्हें इजाजत दे दी हो...

किन्तु एक बात ध्यान देने योग्य है, जब तक वह जिंदा रहे, तब तक रोज उनके घर पर संतो-महात्माओं का तांता लगा रहा, उन्होंने सब को इशारों में ही खुशी के गीत गाने को कहा, गुरू-महिमा, हरि-महिमा वह सुनते रहे, हालांकि वह अब उठकर नाच नहीं पा रहे थे, लेकिन उनके चेहरे की मुस्कान, हाव भाव अभी भी उसी मस्ती में चूर दिख रहे थे। इतने गहरे आघात होने के बाद भी उनके पास शिकायत का कोई स्वर नही था, बस सकारात्मकता के साथ अविरल बहने वाला शुक्राने का गीत था, आनंद था... परमानंद ...ये अवस्था मुझे बिल्कुल वैसी ही अवस्था महसूस हुई, जिसे संत ज्ञानेश्वर जी ने अमृतानुभव में लिखा

म्हणोनि ज्ञानदेव म्हणे। अनुभवामृतें येणें।
सणु भोगिजे सणें। विश्वाचेनि।।

(ज्ञानदेव कहे, अमृत अनुभव प्राप्त करें - विश्व को (जीवन को) एक महोत्सव की तरह मनाइये)
                    (लेखक: अमित चव्हाण, मुंबई )

Friday, July 29, 2022

बस कंडक्टर सी ज़िंदगी Life like a bus conductor

बस कंडक्टर जैसी ये लगती है ज़िंदगी 
जाना तो है कहीं नहीं पर सफ़र है हर रोज़ 

Bus conductor jaisi ye lagti hai zindagi 
Jaana to hai kahin nahin par safar hai har roz
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Life seems to be like a bus conductor
Nowhere to go - yet the journey is every day

Thursday, July 28, 2022

नींद रात भर नहीं आती Can't sleep at night - Neend nahin aati

कुछ लोगों को नींद तो रात भर नहीं आती 
लेकिन उनका ज़मीर हर वक़्त सोया रहता है !!

Kuchh logon ko neend to raat bhar nahin aati
Lekin un ka zameer har vaqt soyaa rehtaa hai 
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Some people may not get any sleep at night
But their conscience is sleeping all the time !!

Wednesday, July 27, 2022

I am not sad because ये दुःख नहीं Ye dukh nahin یہ دکھ نہیں کہ

ये दुःख नहीं कि मुझे अपनी जुस्तजू भी नहीं 
अज़ाब ये है कि अब इसकी आरज़ू भी नहीं 
                                  " फ़रहत शहज़ाद  "

Ye dukh nahin ki mujhay apni justajoo bhi nahin 
 Azaab ye hai ki ab is ki aarzoo bhi nahin 
                     " Farhat Shehzad "
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It's not that I am sad because I am not searching for my (Real) self - 
not trying to find who I am. 
My grief is that now I do not even have a desire for it. 

Justajoo   = Search  तलाश 
Azaab    =   Distress, Pain, Agony, anguish, grief, कष्ट, दुःख 

یہ دکھ نہیں کہ مجھے اپنی جستجو بھی نہیں
عذاب یہ ہے کہ اب اس کی آرزو بھی نہیں 
                          - فرحت شہزاد  -  

Tuesday, July 26, 2022

I kept walking मैं चलता रहा Mein chaltaa rahaa

डर तो लगा था फ़ासला देखकर
पर मैं चलता रहा रास्ता देखकर
ख़ुद-ब-ख़ुद ही नज़दीक आती गई
मेरी मंज़िल  मेरा हौसला देखकर

Dar to lagaa tha faaslaa dekh kar 
Par main chaltaa rahaa raasta dekh kar 
Khud-ba-khud hee nazdeek aati gayi
Meri manzil meraa hauslaa dekh kar
                 ~~~~~~~~~~~~~
Initially, there was some fear after seeing the distance, 
but I kept walking. 
Seeing my courage  - the destination itself came closer to me.

Bad Attitude बुरा स्वभाव

Bad temper - Bad attitude is like a flat tire
Can't go anywhere unless it is changed.

बुरा स्वभाव - बुरा रवैया एक पंक्चर - फ्लैट टायर की तरह होता है
जब तक इसे बदला न जाए  -  कहीं जा नहीं सकते 

Monday, July 25, 2022

मित्रों और सहयोगियों का चुनाव

कुछ लोग आपको शांत और प्रसन्न-चित्त देख कर आपकी शांति भंग करने का प्रयत्न करेंगे 
और आपको उलझनों में डाल कर छोड़ देंगे।

और कुछ लोग आपको अस्त-व्यस्त - चिंताग्रस्त और टुकड़ों में बिखरा हुआ देखेंगे - 
तो आपको प्रेमपूर्वक शांति के मार्ग की ओर ले जाएंगे।

अपने दोस्तों, मित्रों एवं सहयोगियों का चुनाव सावधानी और बुद्धिमानी से करें ।

Choosing Friends and associates

Some people will find you in peace and leave you in pieces.

Some people will find you in pieces and lead you to peace.

Some people - 
Seeing you calm, content, and cheerful - will try to disturb your serenity and leave you sad and confused.

And some people - 
if they find you troubled, anxious, and torn to pieces - will lovingly lead you to the path of peace and happiness.

Choose your friends and associates carefully and wisely.

Michhami Dukkadam मिच्छामी दुक्कड़म

I ask your forgiveness if I ever hurt you with any of my words, actions, or thoughts.  Michhami Dukkadam is an ancient traditional Jain phra...