इन दिनों महाराष्ट्र (भारत) में गणेश विसर्जन का त्योहार मनाया जा रहा है।
गणेश चतुर्थी के दौरान, भगवान गणेश की सुंदर मूर्तियाँ बना कर स्थापित की गईं और श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा-अर्चना की गई ।
अब, उन्हीं मूर्तियों को प्रसन्नता से नाचते हुए शोभा यात्रा के रुप में ले जाकर नदियों या झीलों में विसर्जित किया जा रहा है।
पहली नज़र में यह बहुत अजीब, विरोधाभासी एवं बेतुका सा भी लगता है।
कुछ ही दिन पहले, जिन मूर्तियों की श्रद्धा एवं भक्ति भाव से पूजा की थी, अब उन्हीं को ले जाकर वे पानी में विसर्जित कर रहे हैं।
अगर हम सिर्फ़ बाहरी रस्म को देखें, तो यह अजीब सा लगता है।
लेकिन अगर हम इसके पीछे की दार्शनिक सोच को समझने की कोशिश करें, तो हमें इसमें एक बहुत सुंदर और गहरा संदेश मिल सकता है।
हम जानते हैं कि जो कुछ भी अस्तित्व में आता है, वह अंततः समाप्त हो जाता है।
जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है।
जो भी बनता या बनाया जाता है, वह अंततः नष्ट हो ही जाता है या उसका रुप बदल जाता है।
हमारा शरीर, धन सम्पत्ति, रिश्ते-नाते, देश,समाज एवं सभ्यताएँ और यहाँ तक कि पूरा ब्रह्माण्ड - सब कुछ अस्थायी है और बदलता रहता है।
इन बनते-बदलते और मिटते रुपों के परे निरंतर एकरस एवं एकरुप में स्थिर अर्थात कायम रहने वाली सार्वभौमिक सत्ता अथवा शक्ति को ही सत्य सनातन एवं ब्रह्म या निराकार ईश्वर कहा जाता है।
यदि हम इस दृष्टिकोण से देखें, तो भगवान गणेश की भौतिक मूर्ति परम सत्य नहीं, बल्कि एक प्रतीक है। एक ऐसा प्रतीक जो हमारे मन को ईश्वर से जुड़ने और उस पर ध्यान केंद्रित करने में सहायता करता है।
यह प्रतीक बेशक उपयोगी एवं सार्थक और सम्मान के योग्य तो होता है, लेकिन कोई भी प्रतीक या मूर्ति स्थायी, अनश्वर अथवा अविनाशी नहीं होती।
इसलिए, कुछ समय तक उस प्रतीक या मूर्ति की पूजा करने के बाद लोग प्रसन्नता पूर्वक उसे जल में विसर्जित कर देते हैं।
विसर्जन एक प्रक्रिया है - यह याद दिलाने के लिए कि प्रतीक से प्रेम करें, सम्मान करें, तथा उससे कुछ सीखने का प्रयत्न करें लेकिन रुप, आकार अथवा किसी प्रतीक के मोह में न बंधें।
एक और सुंदर बौद्ध परंपरा भी ऐसा ही संदेश देती है।
कुछ वर्ष पहले मुझे मिशिगन यूनिवर्सिटी में भी ऐसी ही एक घटना देखने का सुअवसर मिला।
कुछ बौद्ध भिक्षुओं को एक सेमिनार में भाग लेने के लिए बुलाया गया था।
सेमीनार के दौरान, उन बौद्ध भिक्षुओं ने रेत और रंगीन पाउडर का इस्तेमाल करके बहुत मेहनत से एक बेहद ही सुंदर डिजाइन बनाया जिसे वो Sand Mandala कहते हैं ।
उसके सूक्ष्म पैटर्न या डिज़ाइन अद्भुत थे। लोग दूर-दूर से उनकी शानदार कलाकृति को देखने आए।
हालाँकि, कई दिनों की कड़ी मेहनत के बाद इसे बनाया गया था। लेकिन वापस जाने से पहले भिक्षुओं ने कहा कि अब वे एक समारोह के रुप में इसे नष्ट कर देंगे।
यूनिवर्सिटी के स्टाफ़ और दूसरे लोग चाहते थे कि वह शानदार कलाकृति जैसी है उसे वैसे ही संभाल कर रखा जाए। लेकिन भिक्षुओं ने कहा कि उनकी परंपरा के अनुसार मंडला (Sand Mandala) को रखा नहीं जा सकता।
एक शानदार समारोह में, उन्होंने उसके ऊपर नृत्य करते हुए उस सुंदर कृति को मिटा दिया।
संदेश सरल था लेकिन गहरा था:
जो कुछ भी बनाया गया है, वह अस्थायी है।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि कुछ बनाया ही न जाए। सृजन ही न किया जाए।
सुंदरता इसलिए अर्थहीन नहीं हो जाती क्योंकि वह हमेशा के लिए नहीं रहती।
असल में, उसका अस्थायी होना ही शायद वह वजह है जिससे हम उसकी और गहराई से सराहना करते हैं।
मंडला को नष्ट करना दुख या अस्वीकृति का कार्य नहीं था।
यहां तो अस्थायीपन अथवा नश्वरता का भी जश्न मनाया गया और खुशी-खुशी स्वेच्छा से प्रिय वस्तुओं को समाप्त होते हुए देखने का अभ्यास किया गया।
गणेश विसर्जन में भी यही दार्शनिक संदेश छिपा है।
भगवान गणेश की प्रतिमा को जल में विसर्जित करना अनादर का प्रतीक नहीं है।
विसर्जन यात्रा तो भक्ति संगीत, गायन, नृत्य, एवं उत्सव से भरी होती है। वहाँ शोक के बजाय हर्ष और उल्लास होता है।
कुछ समय तक उस प्रतीकात्मक प्रतिमा की श्रद्धा पूर्वक पूजा-अर्चना करने के बाद वे खुशी-खुशी नाचते और गाते हुए उसे विदा करने को तैयार हो जाते हैं।
यह जीवन के लिए एक गहरा संदेश और सबक है।
हम अक्सर अपनी पसंदीदा चीज़ों - धन संपत्ति, रिश्ते नाते, अपना यौवन, अपने रुतबे, अपनी उपलब्धियों, पुरानी यादों और यहाँ तक कि अपने विचारों एवं धारणाओं को कस कर थामे रखने की कोशिश में ही अपना जीवन बिता देते हैं। लेकिन सच तो यही है कि भौतिक दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है। किसी वस्तु से प्रेम करने या उसे पूजने का अर्थ यह नहीं है कि उस पर हमेशा के लिए हमारा अधिकार रहना चाहिए।
और उसे जाने देने का यह मतलब नहीं है कि जिसे हमने सराहा और पूजा, वह अर्थहीन था।
गणेश विसर्जन उत्सव में यह संदेह छिपा है कि प्रतिमा एवं प्रतीक तो अस्थायी है, लेकिन वह जिस सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करती है, वह अस्थाई नहीं।
रुप और आकार तो मिट जाते हैं, लेकिन ज्ञान, प्रेम और भक्ति क़ायम रहते हैं।
गणेश विसर्जन का महोत्स्व संसार की हर वस्तु की नश्वरता एवं अस्थायीपन को स्वीकार करने और समय आने पर उन्हें शालीनता से जाने देने का संदेश और अभ्यास है।
यह हमें याद दिलाता है कि अंत अथवा नश्वरता, अस्तित्व के प्राकृतिक काल चक्र का हिस्सा हैं। केवल भय और शोक का कारण नहीं।
यह याद दिलाता है कि रचना और विनाश, आगमन और प्रस्थान, जन्म और मृत्यु, पाना और खोना - ये सभी जीवन-चक्र के अपरिहार्य अंग हैं।
वैसे तो हम ईश्वर की पूजा अर्चना और ध्यान किसी भी रुप में कर सकते हैं, लेकिन अंततः हमें उस रुप और प्रतीक से मुक्त होना पड़ता है - उसे छोड़ना पड़ता है। और स्वयं को याद दिलाना होता है कि ईश्वर किसी एक रुप अथवा आकार तक ही सीमित नहीं है।
अगर किसी चीज़ को - जिस प्रेम भाव और कृतज्ञता के साथ हमने पाया और अपनाया था - उसी प्रेम भाव और कृतज्ञता के साथ उसे छोड़ भी पाएंगे तो शायद हम जीवन के एक बहुत महत्वपूर्ण सत्य को समझने में सफल हो सकेंगे।
अर्थात - समय आने पर हर एक रुप एवं आकार अपने मूल तत्वों में मिल जाता है।
अंततः केवल एक ब्रह्म अथवा ईश्वर ही शेष रहता है।
' राजन सचदेव '
अति उत्तम 🎊👏👏👍
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