Wednesday, January 7, 2026

जीवन में जब द्वन्द बढ़ने लगे

जीवन में जब द्वन्द बढ़ने लगे 
हृदय जब दुःखों से बिखरने लगे    
तो लेना प्रभु का सहारा प्रिये 
दर उसका खुला है खुला ही रहेगा 
तुम्हारे लिए   -   सभी के लिए 

जीवन निरर्थक जो लगने लगे 
भर जाए मन में इक गहरी निराशा 
फैला हो चारों तरफ ही अँधेरा 
न आए नज़र धुंधली सी भी आशा  
पाओं अगर लड़खड़ाने लगें 
छाया से भी घबराने लगें 
तो लेना प्रभु का सहारा प्रिये 
वो करुणा का सागर दया ही करेगा 
तुम्हारे लिए -  सभी के लिए 

जो है अनादि अनंत वही है 
जिसने बनाया ये ब्रह्मांड सारा 
वो ही रचयिता वही कर्ता धर्ता
वही एक है सब का पालनहारा 
करो उसका चिंतन - चिंता को छोड़ो 
सुमिरन में 'राजन' मन अपना जोड़ो 
रखना जला के श्रद्धा के दिए 
दयालु है वो तो दया ही करेगा 
तुम्हारे लिए -  सभी के लिए 
            " राजन सचदेव "

 (बहर, तर्ज़ -- कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे - तब तुम मेरे पास आना प्रिये )

द्वन्द = संघर्ष, टकराव, कलह, अव्यवस्था, विशृंखलता, अशांति Conflicts, Disorder, Disarray, confusion, etc.

14 comments:

  1. Usi ke sahare jiye hai

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  2. आनंद और द्वंद में एक ही सहारा - प्रभु निरंकार!
    आपकी यह कविता दिल को राहत देने वाली है जी।🙏🙏

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  3. Absolutely true.Bahut hee Uttam aur shikhshadayak bhav wali Rachana ji.🙏

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  4. Well said.....

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  5. Beautiful ji. 👌🙏🙏

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  6. 👍🎊👏👌very nice ji 🌷

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  7. Inspiring Rajanjee 🙏🙏 Have forwarded your blog to two of my friends.

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