Tuesday, January 20, 2026

प्रशंसा में संकोच - आलोचना में तेज़

हम अक्सर किसी की प्रशंसा करने में संकोच करते हैं लेकिन आलोचना करने में बहुत तेज़ होते हैं।
जब कोई व्यक्ति कोई समझदारी की बात करता है या कुछ अच्छा काम करता है तो हम अक़्सर कोई न कोई बहाना बना कर उसकी प्रशंसा करने से संकोच करते हैं। और उसकी चर्चा भी नहीं करना चाहते। और अगर किसी अच्छी बात की चर्चा करना भी चाहें तो उनका नाम छुपा लेते हैं - जैसे कि उनकी प्रशंसा करने से हमारी अपनी इज़्ज़त कम हो जाएगी और उनके सामने हमारी अपनी गरिमा कम हो जाएगी।
और दूसरी तरफ - जब कोई कुछ ऐसा कहता या करता है जो हमें पसंद नहीं है, तो हम तुरंत सवाल और आलोचना करने लगते हैं, और उसे बढ़ा-चढ़ाकर लोगों को बताने लगते हैं।

कहते हैं कि बुराइयाँ अच्छाइयों से ज़्यादा तेज़ी से फैलती हैं।
बाइबल के अनुसार: -
“तुम्हें अपने भाई की आँख में पड़ा तिनका तो दिखाई देता है,
लेकिन अपनी आँख में पड़े लट्ठे पर ध्यान क्यों नहीं देते?”
(न्यू टेस्टामेंट - ल्यूक 6:41)

15वीं सदी के संत रेन जी ने भी इस बात को इस तरह समझाया : 
"बट बीज सम पर-अवगुण जिनको कर तू मन मेरु दिखावे
मेरु सम अपनो अवगुण तिनको कर तू बट-बीज जनावे
ईम संतन 'रेन' कहे मन स्यों पर-अवगुण ढांप तब-ही सुख पावे"* 
अर्थात;
“हे मन, दूसरों के दोष, चाहे वे बट बीज के समान - सरसों के दाने से भी छोटे हों,
तुम उन्हें दुनिया के सामने पहाड़ जैसा बना कर दिखाते हो।
और पर्वत के समान अपने दोषों को तुम बट बीज अथवा सरसों के दाने से भी छोटा मानते हो।
संत 'रेन' कहते हैं: दूसरों के दोष छिपाकर, उन्हें नज़रअंदाज़ करके ही मन को शांति और सच्चा आनंद प्राप्त हो सकता है।”

यह ज्ञान सार्वभौमिक एवं शाश्वत सत्य है। 
हम हमेशा दूसरों की कमियों को बड़ा करके और अपनी कमियों को कम करके देखते हैं।
संत रेन जी ने आगे कहा कि इसका उल्टा भी सच है।
हम अपनी खूबियों और अच्छे कामों को हमेशा पर्वत जैसा महान करके दिखाते हैं
जबकि दूसरों के गुण - उनके अच्छे विचार और अच्छे कामों को बट बीज के समान कम करके देखते और दिखाते हैं।
लेकिन मन की शांति दूसरों को सुधारने से नहीं — बल्कि स्वयं को सुधारने से प्राप्त होती है।

हमेशा दूसरों को दोष देने और उनकी आलोचना करने के बजाय, हमें अपना ध्यान अपने अंदर मोड़ना चाहिए। 
हमारा काम अपने विचारों को देखना, अपने किरदार को सुधारना और अपनी कमजोरियों को दूर करना है।
क्योंकि अन्ततः तो हम स्वयं अपने लिए ही उत्तरदायी हैं, दूसरों के लिए नहीं।
                                                   " राजन सचदेव "

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