भगवान कृष्ण कहते हैं कि बेड़ी तो आखिर बेड़ी ही है -
चाहे लोहे की हो या सोने की।
भापा राम चंद जी कपूरथला वाले कहा करते थे कि चाहे किसी ने अपने सर पर एक मन (40 किलो) लोहा उठाया हो या एक मन सोना -- भार तो दोनों के सर पर एक बराबर ही है
लेकिन अगर गर्दन टूटने लगे तो जिस ने सर पर लोहा उठाया है वो तो फ़ेंक भी देगा
लेकिन जिसने सर पर सोना उठाया हो, वो जल्दी फैंक भी नहीं पाएगा।
अर्थात बंधन तो बंधन ही है
—चाहे कैसा भी हो।
हमें स्वयं अपने अंदर झाँक कर देखना होगा कि क्या हम मुक्त हैं
या अभी भी किसी नए या पुराने बंधन में बंधे हुए हैं?
" राजन सचदेव "
जीते जी मुक्त हैं तेरे, दर पे जो आ गये
ReplyDeleteइस एक से थे आए, इसी में समा गये।
1.ग़म हो के या खुशी हो, वो रहते हैं एक से।
इक को नहीं वो भूलते, मिलकर अनेक से।
भटकें न रास्तों में वो, मंज़िल को पा गए।
2.क्या खेल तूने रच दिया, रूह और शरीर का
इंसान जैसा जिस्म है, वलियों का पीर का
जिनको भरम ये पड़ गया वो डगमगा गए।
3.बिखरे क़दम क़दम पे यूं माया के जाल हैं
तेरे सहारे जो चलें, वो बा कमाल हैं।
गुज़रे जिधर से प्यार की, खुशबू उड़ा गए।
4. बंधन है ख़ुद से जोड़ना हर इक सिफ़ात को
मुक्ति है तुझपे छोड़ना, हर एक बात को
'रौशन' जो समझे राज़ ये दुनिया पे छा गये।