भागवत पुराण के अनुसार, हिरण्यकश्यप नाम का एक शक्तिशाली राजा अन्य असुरों की भाँति अमरत्व की तीव्र इच्छा से ग्रसित था।
अपनी इस अभिलाषा की पूर्ति के लिए उसने कठोर तपस्या की।
अंततः ब्रह्मा ने उसे कुछ शर्तों के आधीन अमरत्व का वरदान दे दिया।
उस वरदान से समर्थ होकर वह अत्यंत अहंकारी और अत्याचारी बन गया।
उसने अपने राज्य के सभी लोगों को आदेश दिया कि वे उसी को सर्वोच्च ईश्वर मानकर उसकी उपासना करें। भयग्रस्त प्रजा ने उसके आदेश का पालन किया लेकिन उसके पुत्र प्रह्लाद ने ऐसा करने से इंकार कर दिया।
प्रह्लाद ने घोषणा की कि केवल एक सर्वव्यापक - सर्वत्र व्याप्त “राम” ही उपासना के योग्य है — जो पृथ्वी, जल, आकाश और यहां तक कि प्रत्येक प्राणी के अंतर में भी विद्यमान है।
प्रह्लाद की इस अडिग आस्था से हिरण्यकशिपु क्रोधित हो उठा।
क्रोध में उसने अपने ही पुत्र को कई बार मारने का प्रयास किया, परंतु प्रह्लाद हर बार किसी चमत्कारिक रुप से बच गए।
अंततः, हताश होकर, हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन, होलिका से मदद मांगी।
होलिका के पास एक विशेष वस्त्र था, एक ऐसा शाल जिसे ओढ़ लेने से अग्नि उसे नहीं जला सकती थी।
योजना थी कि वह बालक प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर प्रज्वलित अग्नि में बैठेगी।
उस विशेष वस्त्र के संरक्षण में वह स्वयं तो सुरक्षित रहेगी और बालक प्रह्लाद जल जाएगा।
किन्तु नियति को कुछ और ही स्वीकार था।
जैसे ही अग्नि प्रचंड हुई, होलिका के शरीर पर ओढ़ा हुआ शाल उड़ कर प्रह्लाद पर गिर गया और उसे ढँक लिया।
होलिका भस्म हो गई, जबकि प्रह्लाद सकुशल अग्नि से बाहर निकल आया।
अन्य अनेक प्राचीन हिन्दू कथाओं की भाँति, चाहे इसे ऐतिहासिक घटना माना जाए या एक रुपक, यह कहानी भी गहरे प्रतीकात्मक अर्थ से परिपूर्ण है।
होलिका उस दुष्ट भावना का प्रतीक है जो बाहरी सदाचार के आवरण में छिपी रहती है।
उसका शाल अथवा लबादा उस “अच्छाई के मुखौटे” का प्रतीक है — जो मधुर वाणी, आकर्षक व्यक्तित्व और दान इत्यदि सार्वजनिक धार्मिकता का दिखावा करके अपने असत्य को समाज की नज़रों और लोगों के तिरस्कार एवं क्रोध की अग्नि से बचाए रखता है।
जब तक असत्य की परीक्षा नहीं होती, वह सुरक्षित प्रतीत होता है।
किन्तु जब उसे सत्य की अग्नि में रखा जाता है — जब उसका सामना प्रह्लाद जैसी निष्कपट पवित्रता से होता है — तब वह आवरण टिक नहीं पाता। मुखौटा उतर जाता है, और वास्तविक चेहरा प्रकट हो जाता है।
असत्य जल जाता है, और अंततः सत्य की जीत होती है। निष्कलुषता सुरक्षित रहती है।
हमें अपने जीवनकाल में भी कई बार ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं।
अनेक लोग संत होने का आडंबर करते हैं।
वे अपनी महत्वाकांक्षा और स्वार्थ को आध्यात्मिक भाषा और दान-धर्म के पीछे छिपा लेते हैं।
उन्हें विश्वास होता है कि उनका बाहरी व्यक्तित्व उन्हें आलोचना और परिणामों की अग्नि से बचा लेगा।
किन्तु जब सच्ची निष्ठा सामने आती है, तो दिखावा ढह जाता है।
सत्य में वह शक्ति है जो अंततः बाहरी आवरण के पीछे छिपी वास्तविकता को उजागर कर देती है।
होलिका दहन का अनुष्ठान — जो इस घटना की स्मृति में किया जाता है — केवल लोककथा या परंपरा मात्र नहीं है।
यह हमें याद दिलाता है कि पाखंड बहुत देर तक नहीं चलता - असत्य का आवरण एक दिन उड़ जाता है और सत्य और सच्ची भक्ति की ही विजय होती है।
जब हम इन कथाओं और कहानियों को ऊपरी सतह से ऊपर उठ कर उनके प्रतीकात्मक अर्थ पर मनन करते हैं, तब हमारे पुराने पर्व और त्यौहार केवल रीति-रिवाज नहीं रह जाते — बल्कि अंतर्मन के जागरण का संदेश बन जाते हैं।
असली होलिका - बाहर का पाखंड और दिखावा है जिसे जलाना है।
असली प्रह्लाद - जिसे बचाना है वह कोई और बालक अथवा बच्चा नहीं - अंतरात्मा की बच्चों जैसी निष्कपटता है।
यदि इस दृष्टि से सोचा जाए, तो यह उत्सव आंतरिक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।
" राजन सचदेव "
* नोट:
प्रह्लाद की यह कहानी सतयुग की है - त्रेतायुग में अयोध्या के राजा दशरथ पुत्र राम के जन्म से बहुत पहले की।
अतः जब प्रह्लाद ने “राम” नाम का उच्चारण किया, तो उसका संकेत ऐतिहासिक अयोध्या नरेश की ओर नहीं था।
प्राचीन धर्मग्रंथों में पाए जाने वाले राम” शब्द का अर्थ उस सर्वव्यापक परम सत्ता से है — जो हर प्राणी के अंतर में निवास करती है।
“सर्वेषु रमते इति रामः”
अर्थात — जो सर्वत्र विद्यमान है और सब प्राणियों में रमण करता है, उसे राम कहते हैं।
— राजन सचदेव -
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