हर संस्कृति, धर्म और समुदाय का अपना-अपना कैलेंडर होता है, और सभी में नए वर्ष की शुरुआत अलग-अलग दिन से होती है।
हिंदू, सिख, जैन, ईसाई, मुस्लिम और बौद्ध - सभी अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार नववर्ष मनाते हैं।
हिंदू पंचांग के अनुसार, नववर्ष - चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा से प्रारंभ होता है।
भारत में मुख्य रुप से विक्रमी संवत का पंचांग अथवा कैलेंडर प्रचलित है जिसकी शुरुआत 57 ईसा पूर्व से मानी जाती है।
इसके विपरीत, ग्रेगोरियन कैलेंडर, जिसे आमतौर पर पश्चिमी या ईसाई कैलेंडर कहा जाता है, आज सबसे अधिक प्रचलित है। इसका वैश्विक प्रसार मुख्यतः यूरोपीय उपनिवेशवाद और बाद में एकरुपता व सुविधा के कारण हुआ।
पहली जनवरी के लोकप्रिय होने का एक और प्रमुख कारण मीडिया और व्यापार का प्रभाव है। जिस ने इसे उत्सव, विज्ञापन और सामाजिक परंपराओं के माध्यम से व्यापक रुप से प्रचलित कर दिया है।
फिर भी, पारंपरिक नववर्ष लुप्त नहीं हुए हैं।
बहुत से समुदाय आज भी अपने-अपने तरीके से, अक्सर परिवार, मित्रों और सीमित सामाजिक दायरों में, अपना नववर्ष मनाते हैं।
लेकिन इनके मनाने के तौर तरीकों में काफी अंतर होता है।
जहाँ पहली जनवरी को अक्सर खाने-पीने, नृत्य और उपहारों के आदान-प्रदान जैसे उत्सवों के साथ मनाया जाता है, वहीं पारंपरिक हिंदू नववर्ष का एक गहरा प्रतीकात्मक महत्व होता है।
इस अवसर पर कड़वे नीम के पत्तों और मीठे गुड़ का मिश्रण तैयार किया जाता है।
पहले इसे ईश्वर को नैवेद्य के रुप में अर्पित किया जाता है, और फिर परिवार व मित्रों में प्रसाद के रुप में बाँटा जाता है।
यह सरल-सा अनुष्ठान अपने आप में एक गहन दार्शनिक अर्थ समेटे हुए है।
नीम की कड़वाहट और गुड़ की मिठास का यह संगम जीवन में द्वैत का प्रतीक है - जैसे सुख और दुख, सफलता और असफलता, आनंद और पीड़ा इत्यादि।
यह हमें याद दिलाता है कि जीवन न तो केवल मीठा होता है, न ही केवल कड़वा, बल्कि दोनों का मिश्रण है।
इस मिश्रण को भगवान को अर्पित करके और प्रसाद के रुप में ग्रहण करके, हम स्वयं को आने वाले वर्ष में जो भी मिले, उसे प्रसाद समझ कर स्वीकार करने के लिए तैयार करते हैं।
इसे अपने प्रियजनों के साथ बाँटना इस समझ को भी दर्शाता है कि आपसी संबंधों में भी मीठे और कड़वे दोनों तरह के क्षण आते रहते हैं। कड़वे और मीठे के इस मिश्रण को बांटना और ग्रहण करना हर परिस्थिति में अपने आपसी संबंधों और रिश्तों को बनाए रखने का संदेश देता है।
हम अक्सर पुरानी परंपराओं को पुराना और अप्रासंगिक समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, लेकिन जब हम उन्हें समझने की कोशिश करते हैं, तो उनके पीछे छुपी हुई गहरी बुद्धिमत्ता प्रकट होने लगती है।
उनके सही अर्थ को समझकर, हम उन्हें खुले मन से मना भी सकते हैं और दूसरों की संस्कृतियों व परंपराओं का सम्मान भी कर सकते हैं।
ईश्वर हम सब पर अपनी कृपा बनाए रखें।
" राजन सचदेव ”
अति उतम
ReplyDelete