महाशिवरात्रि का अर्थ है शिव तत्त्व को जानना और अपने भीतर शांति को जगाना
इस रात्रि में नक्षत्र एक विशेष स्थिति में होते हैं, जिसे ध्यान के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
महाशिवरात्रि वह दिन है जब शिव तत्त्व को पृथ्वी के अत्यंत निकट माना जाता है।
चेतना, आभा या वह पारलौकिक सत्ता, जिसे सामान्यतः भौतिक जगत से ऊपर माना जाता है, इस दिन नक्षत्रों के विशेष संयोग के कारण पृथ्वी तत्व के निकट आ जाती है। इसलिए इस रात्रि में जागकर ध्यान करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
शिव और पार्वती का विवाह एक प्रतीक
शिव पुरुष अर्थात आत्मा हैं और पार्वती शक्ति — जो भौतिक जगत में सृजन की शक्ति है।
शिव और पार्वती का विवाह वास्तव में आध्यात्मिक और भौतिक तत्वों का मिलन है।
आत्मा और शिव में कोई भेद नहीं है।
हमारा वास्तविक स्वरुप अर्थात आत्मा का सच्चा स्वरुप शिव ही है।
"सत्यम् शिवम् सुन्दरम्"
शिव सत्य हैं, अद्वैत — शांति और अनंत सौंदर्य के प्रतीक हैं।
शिव रात्रि में जागरण का अर्थ है अपने भीतर के अद्वैत शिव तत्त्व को जागृत करना और उसके सौंदर्य और असीम शांति का अनुभव करना।
रात्रि ही क्यों?
रात्रि अर्थात रात - जो हमें विश्राम और शांति प्रदान करती है।
रात्रि का अर्थ है शारीरिक क्रियाओं से विश्राम लेकर अपने निज शांत स्वरुप में स्थित होना।
दुसरे शब्दों में शिवरात्रि आत्मा (शिव) में शरण लेने का समय है।
यह अपने भीतर स्थित शिव तत्त्व को जगाने का समय है।
जैसा कि भगवद् गीता में कहा गया है —
"आत्मनैव आत्मना तुष्टः"
जो आत्मा में अर्थात स्वयं में संतुष्ट है, वही वास्तविक शांति का अनुभव करता है।
जीवन में सच्ची शांति के लिए तीन चीज़ें अनिवार्य हैं।
भौतिक और आर्थिक सुरक्षा
मानसिक स्थिरता एवं शांति
आत्मिक आनंद
आर्थिक सुरक्षा के बिना, स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य के बिना, हम पूर्ण शांति का अनुभव नहीं कर सकते।
यदि हमारे आसपास अशांति है, कोलाहल और उपद्रव है तो मन शांत नहीं रह सकता।
घर में और आसपास के वातावरण में शांति चाहिए।
शरीर और मन में भी सामंजस्य चाहिए।
और आत्मा में — अर्थात अवचेतन स्तर पर भी शांति चाहिए।
कभी-कभी हमारे वातावरण में शांति होती है, स्वास्थ्य भी अच्छा होता है और मन भी कुछ हद तक शांत रहता है लेकिन फिर भी यदि आत्मा व्याकुल है, तो कोई भी वस्तु हमें सच्चा सुख और वास्तविक शांति नहीं दे सकती।
इसलिए आत्मिक शांति की प्राप्ति भी अत्यंत आवश्यक है।
उपरोक्त सभी के समन्वय से ही जीवन में पूर्ण शांति संभव है।
इनमें से किसी भी एक के बिना शांति अधूरी है।
शिवरात्रि दिव्य चेतना में शरण लेने की प्रेरणा है, जो हमारी चेतना के सभी स्तरों — सचेत, अवचेतन और अचेतन मन — को शांति और सुकून प्रदान करती है।
अतः शिव तत्त्व में विश्राम करना और उसी में शरण लेना ही महाशिवरात्रि का सार है।
जब मन, बुद्धि और अहंकार दिव्यता में विश्राम करते हैं, वही पूर्ण और शाश्वत शांति है।
ध्यान के लिए पावन समय
शिवरात्रि आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है।
प्राचीन ऋषि और मनीषियों ने कहा है — “यदि प्रतिदिन संभव न हो, तो कम से कम शिवरात्रि और महाशिवरात्रि के दिन तो अवश्य ध्यान करें, जागरण करें और अपने अंतर में स्थित दिव्यता को जागृत करें।”
यही महाशिवरात्रि का वास्तविक संदेश है —
“दिव्यता तुम्हारे भीतर है — उसे जगाओ और जागते रहने दो!”
" राजन सचदेव "
नोट:
शिवरात्रि (या मासिक शिवरात्रि) प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भगवान शिव को समर्पित उपवास और पूजा का दिन है।
महाशिवरात्रि वर्ष में एक बार फरवरी या मार्च में आती है और यह अत्यंत महत्वपूर्ण, ऊर्जावान तथा आध्यात्मिक दृष्टि से शक्तिशाली रात्रि मानी जाती है, जिसमें रात्रि-जागरण, उपवास और भव्य उत्सव का आयोजन किया जाता है।
Very true uncle ji. Thank you 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
ReplyDeleteSudha Saraswat 🙏🙏🙏🙏
ReplyDeleteWe have been doing it for the longest. But it was the best with your explanations. 🙏🙏🙏🙏
DeleteBahut Sundar 🌺🙏🏻
ReplyDelete"आत्मनैव आत्मना तुष्टः"
ReplyDeleteAti sunder explanation!
ReplyDeleteAti sunder explanation!
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