कहां सुदामा बापुरो कृष्ण मिताई जोग॥
(अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना)
(अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना)
शब्दार्थ :
रहीम जी कहते हैं कि वह लोग धन्य हैं जो ग़रीबों से भी प्रेम करते हैं।
उन्हें याद रखते हैं और उनसे हित अर्थात प्रीति निभाते हैं।
कहां ग़रीब सुदामा और कहां कृष्ण - मथुरा के राजा
क्या बेचारा सुदामा कृष्ण की मित्रता के योग्य था?
भावार्थ :
अधिकतर लोग धन, शक्ति और प्रभुता पाने के बाद बदल जाते हैं।
अधिकतर लोग धन, शक्ति और प्रभुता पाने के बाद बदल जाते हैं।
प्रभुता पाने के बाद तो वे केवल अमीर और प्रभावशाली लोगों से ही सम्बन्ध रखना चाहते हैं और अपने पुराने साधारण एवं ग़रीब मित्रों सम्बन्धियों को निम्न दृष्टि से देखने लगते हैं - उनके साथ संबंध बनाए रखना अपना अपमान समझने लगते हैं।
लेकिन धन्य हैं वह लोग जो धन और प्रभुता पाने के बाद भी नहीं बदलते और अपने पुराने मित्रों, संबंधियों से पहले की तरह ही प्रेम निभाते हैं।
कृष्ण और सुदामा में अब कोई भी समानता नहीं थी।
कृष्ण अब राजा बन चुके थे लेकिन सुदामा तो दरिद्र ही रह गए थे। क्या वो किसी भी तरह से कृष्ण की बराबरी कर सकता था?
फिर भी कृष्ण अपने बचपन के मित्र सुदामा को नहीं भूले और न ही उसके प्रति उनका व्यवहार बदला।
राजा बन जाने के बाद भी उन्होंने अपनी पुरानी मित्रता और प्रेम को उसी तरह निभाया।
लेकिन धन्य हैं वह लोग जो धन और प्रभुता पाने के बाद भी नहीं बदलते और अपने पुराने मित्रों, संबंधियों से पहले की तरह ही प्रेम निभाते हैं।
कृष्ण और सुदामा में अब कोई भी समानता नहीं थी।
कृष्ण अब राजा बन चुके थे लेकिन सुदामा तो दरिद्र ही रह गए थे। क्या वो किसी भी तरह से कृष्ण की बराबरी कर सकता था?
फिर भी कृष्ण अपने बचपन के मित्र सुदामा को नहीं भूले और न ही उसके प्रति उनका व्यवहार बदला।
राजा बन जाने के बाद भी उन्होंने अपनी पुरानी मित्रता और प्रेम को उसी तरह निभाया।
सुदामा को ग़रीब और असहाय समझ कर कृष्ण ने उस पर दया नहीं की - उसे बाहर की डयोढ़ी में बैठ कर प्रतीक्षा करने के लिए नहीं कहा। बल्कि स्वयं उन्हें लेने के लिए नंगे पाँव भाग कर मुख्य द्वार पर आए और अंदर ला कर उन्हें अपने आसन पर बिठाया - उनके मिट्टी और कीचड़ से सने पाँव स्वयं अपने हाथों से धोए।
यह होती है महानता। इसे कहते हैं बड़प्पन।
विचारणीय है कि कृष्ण की महानता इस बात से नहीं है कि वह कोई महाराजा थे।
उनकी महानता इस बात में है कि महाराजा होते हुए भी बिना किसी लज्जा और शर्म से सबके सामने उन्होंने अपने ग़रीब मित्र को गले से लगाया - उसे ऊँचे सिंहासन पर बिठाया और किसी भी तरह से सुदामा को अपने बड़प्पन अथवा उसके छोटेपन का एहसास नहीं होने दिया। धन और वस्त्र इत्यादि से उसकी सहायता भी की, लेकिन गुप्त रुप से - और किसी भी तरह से कोई एहसान नहीं जताया।
कृष्ण की महानता इस बात से भी नहीं है कि वह जगत-गुरु थे या उनके लाखों अनुयायी थे।
बल्कि इस बात में है कि हालाँकि गीता-उपदेश के बाद अर्जुन उनका शिष्य बन गया था, इसके बावजूद भी कृष्ण उस के सारथी बने रहे।
कृष्ण ने अपने शिष्य का सारथी बनने में भी अपना अपमान नहीं समझा।
जहां एक ओर कृष्ण ने सांख्य और योग की गहन विचारधाराओं - तथा ज्ञान एवं भक्ति योग को गीता के माध्यम से समझाया तो वहीं स्वयं अपने कर्म - विनम्रता और मधुर स्वभाव से संसार को कर्म योग करते हुए सदा विनम्र बने रहने की प्रेरणा भी दी।
' राजन सचदेव '
सत्यम एव जयते
ReplyDeleteDHAN NIRANKAR JI
ReplyDeleteRajan ji, You are also one of the Great Nirankari Mahatma , from when you are very Younger boy in Ludhiana, I salute you
ReplyDeleteDhan Nirankar Ji
ReplyDelete🙏🙏🙏
ReplyDeleteVery true.
ReplyDeleteSudha Saraswat
🙏🙏
ReplyDelete🙏
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