Saturday, August 1, 2026

रेत पर ही घर बना लेना अक़्लमंदी नहीं

रेत पर ही घर बना लेना अक़्लमंदी नहीं 
इश्क़ में ख़ुद को मिटा लेना अक़्लमंदी नहीं 

दूसरों को आसमानों पर चढ़ाने के लिए 
हसरतें अपनी मिटा लेना अक़्लमंदी नहीं 

सैर बेशक कीजिए इस दुनिया के बाज़ार की 
दिल मगर इस से लगा लेना अक़्लमंदी नहीं 

एक दिन तो छोड़ के सब को चले जाना है पर 
आज ही दूरी बना लेना - अक़्लमंदी नहीं 

चार दिन की ज़िंदगी में ख़ामख़ा ही दोस्तो
हर किसी की बद् दुआ लेना अक़्लमंदी नहीं 

और इक उड़ता परिंदा भी पकड़ने के लिए 
हाथ में जो है गवा लेना अक़्लमंदी नहीं **

माज़ी को तो हम बदल सकते नहीं हरगिज़ मगर 
मुस्तक़बिल को भी गवा लेना अक़्लमंदी नहीं 

बाँटने से ज्ञान 'राजन'  कम नहीं होता कभी 
इल्म को पाकर छुपा लेना अक़्लमंदी नहीं  
                     " राजन सचदेव " 


अक़्लमंदी       =     बुद्धिमता, स्यानप Wisdom, Intellect
ख़्वा-मख़्वाह (फ़ारसी) (अक़्सर बोलने में कहा जाता है - ख़ामख़ा:) = अनावश्यक, बेवजह, बेकार, ज़बरदस्ती, न चाहते हुए भी 
माज़ी     = अतीत, भूतकाल, बीता हुआ समय, वो समय जो बीत चुका हो Past 
मुस्तक़बिल = भविष्य, आने वाला समय Future 
इल्म          =  ज्ञान Knowledge, Wisdom 

**  (एक और परिंदा पकड़ने के लालच में जो हाथ में है वो भी गवा लेना अक़्लमंदी नहीं होती 
अर्थात नए दोस्त, संबंधी, अथवा समर्थक एवं अनुयायी बनाने के लालच में 
जो हमारे पास पहले से हैं उन्हें खो देना समझदारी नहीं है)

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