रेत पर ही घर बना लेना अक़्लमंदी नहीं
इश्क़ में ख़ुद को मिटा लेना अक़्लमंदी नहीं
दूसरों को आसमानों पर चढ़ाने के लिए
हसरतें अपनी मिटा लेना अक़्लमंदी नहीं
सैर बेशक कीजिए इस दुनिया के बाज़ार की
दिल मगर इस से लगा लेना अक़्लमंदी नहीं
एक दिन तो छोड़ के सब को चले जाना है पर
आज ही दूरी बना लेना - अक़्लमंदी नहीं
चार दिन की ज़िंदगी में ख़ामख़ा ही दोस्तो
हर किसी की बद् दुआ लेना अक़्लमंदी नहीं
हर किसी की बद् दुआ लेना अक़्लमंदी नहीं
और इक उड़ता परिंदा भी पकड़ने के लिए
हाथ में जो है गवा लेना अक़्लमंदी नहीं **
माज़ी को तो हम बदल सकते नहीं हरगिज़ मगर
मुस्तक़बिल को भी गवा लेना अक़्लमंदी नहीं
बाँटने से ज्ञान 'राजन' कम नहीं होता कभी
इल्म को पाकर छुपा लेना अक़्लमंदी नहीं
" राजन सचदेव "
अक़्लमंदी = बुद्धिमता, स्यानप Wisdom, Intellect
ख़्वा-मख़्वाह (फ़ारसी) (अक़्सर बोलने में कहा जाता है - ख़ामख़ा:) = अनावश्यक, बेवजह, बेकार, ज़बरदस्ती, न चाहते हुए भी
माज़ी = अतीत, भूतकाल, बीता हुआ समय, वो समय जो बीत चुका हो Past
मुस्तक़बिल = भविष्य, आने वाला समय Future
इल्म = ज्ञान Knowledge, Wisdom
** (एक और परिंदा पकड़ने के लालच में जो हाथ में है वो भी गवा लेना अक़्लमंदी नहीं होती
अर्थात नए दोस्त, संबंधी, अथवा समर्थक एवं अनुयायी बनाने के लालच में
जो हमारे पास पहले से हैं उन्हें खो देना समझदारी नहीं है)
Beautifully Shared
ReplyDeletewah ji wah 🎊🙏👍🎊👌
ReplyDeleteBahut hee sunder Rachana ji .🙏
ReplyDeleteLet’s flow with the flow of Almighty 🙏
ReplyDeleteBeautiful
ReplyDeleteRev. Rajan Ji,
ReplyDeleteYou have beautifully woven the life lessons into your shayari. After reading your beautiful verses, a few lines came to my mind as well.
Maaf karke dil ko halka kar liya jaaye dosto,
Dooriyon ka bojh umar bhar dho lena aqalmandi nahin.
Har bashar mein hai Khuda, har manzar usi ka banaya hua,
Phir kisi shakhs ko kamtar samajh lena aqalmandi nahin.
Jisko bhi milo, muskura kar gale lagana seekho,
Nafraton ka hisaab rakh lena aqalmandi nahin.
Rishte jeetne hon to pehle khud ko jeetna seekho,
Aham ko dil mein basa lena aqalmandi nahin.
Prem baantne se hi badhta hai ye khazana 'Mandeep',
Is daulat ko dil mein chhupa lena aqalmandi nahin.
माफ़ करके दिल को हल्का कर लिया जाए दोस्तों,
दूरियों का बोझ उम्र भर ढो लेना अक़्लमंदी नहीं।
हर बशर में है ख़ुदा, हर मंज़र उसी का बनाया हुआ,
फिर किसी शख़्स को कमतर समझ लेना अक़्लमंदी नहीं।
जिसको भी मिलो, मुस्कुराकर गले लगाना सीखो,
नफ़रतों का हिसाब रख लेना अक़्लमंदी नहीं।
रिश्ते जीतने हों तो पहले ख़ुद को जीतना सीखो,
अहम को दिल में बसा लेना अक़्लमंदी नहीं।
प्रेम बाँटने से ही बढ़ता है ये ख़ज़ाना 'मनदीप',
इस दौलत को दिल में छुपा लेना अक़्लमंदी नहीं।
WAH JI WAH DHAN NIRANKAR JI
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