Wednesday, April 2, 2025

When the mind is clear

When the mind is clear, there are no questions.
But ...
When the mind is troubled, there are no answers. 

When the mind is clear, questions disappear on their own.
Because clarity eliminates doubts and brings understanding. 

A calm, steady, and focused mind sees reality without distortion.
A peaceful mind sees things as they are - without confusion or doubt. 

On the other hand, when the mind is disturbed, no answer seems satisfactory.
Because agitation clouds our perception. 
Many uncertainties in life arise from overthinking or unnecessary worry. 
Anxiety, fear, and doubt create a fog that distorts reality, making even simple problems seem hard to solve.
No answer feels sufficient, and even the best advice appears ineffective. 
The troubled and agitated mind can not recognize solutions that may already be present.

Ultimately, the state of our mind determines our perception. 
Peace is not just the absence of problems and conflicts. 
It is the presence of clarity. 
A quiet and clear mind can find answers quickly, 
while a restless mind struggles even with the most obvious truths. 
Therefore, it is important to maintain stability, clarity, and balance in mind.
                          " Rajan Sachdeva "

जब मन शांत और स्थिर होता है

जब मन शांत और स्थिर होता है, तो वहां कोई प्रश्न नहीं उठते।
लेकिन जब मन अशांत होता है, तो कोई उत्तर नहीं मिलते।

जब मन स्पष्ट होता है, तो प्रश्न स्वयंमेव ही मिट जाते हैं।
क्योंकि स्पष्टता संदेह को समाप्त कर के विवेक को जन्म देती है।

एक शांत - स्थिर और केंद्रित मन वास्तविकता को बिना किसी विकृति के देखता है।
वो हर वस्तु और परिस्थिति को उसी रुप में देखता है, जैसी कि वे वास्तव में हैं—बिना किसी भ्रम या संदेह के।

इसके विपरीत, जब मन अशांत होता है, तो कोई भी उत्तर संतोषजनक नहीं लगता।
क्योंकि उत्तेजना - व्याकुलता और अशांति हमारी सोच को धुंधला कर देती है।
जीवन में कई अनिश्चितताएँ और उलझनें तो ज़्यादा सोचने या अनावश्यक चिंता से पैदा होती हैं।
चिंता, भय और संदेह का कोहरा हमारे दृष्टिकोण को बिगाड़ देता है, जिससे छोटी छोटी समस्याएं भी बहुत बड़े संकट के समान लगने लगते हैं।
कोई भी समाधान पर्याप्त नहीं लगता, और अच्छी से अच्छी सलाह भी व्यर्थ प्रतीत होती है। 
व्याकुल और अस्थिर मन किसी ऐसे समाधान को भी नहीं देख पाता, जो सामने ही होते हैं। 

अंततः, हमारी मानसिक स्थिति ही हमारी दृष्टि, और अवधारणा को निर्धारित करती है। 
हमारी समझ और विवेक को तय करती है।

शांति का अर्थ केवल समस्याओं और संघर्षों का न होना नहीं है।
शांति संघर्षों की अनुपस्थिति पर नहीं बल्कि मन की अवस्था पर निर्भर करती है।  
एक शांत और स्थिर मन सही उत्तर सहजता से खोज लेता है, 
जबकि एक अशांत मन को सरल से सरल सत्य को समझने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। 
इसलिए मन में स्थिरता, स्पष्टता और संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। 
                            " राजन  सचदेव " 

Tuesday, April 1, 2025

First of April

Instead of making 
             " April Fool"  

Plant a Tree and make the 
              "April Cool "



















Monday, March 31, 2025

Embracing Impermanence

Impermanence and change or transformation are the immutable - unchanging principles of Nature.

When we finally understand that nothing in life is permanent, we become more tolerant, patient, and less judgmental. 
Recognizing the fleeting nature of all things helps us let go of resentment, accept imperfections, and approach life with greater compassion. 
When we truly realize that joy and sorrow, success and failure, relationships and circumstances are all temporary, our perspective shifts. 
We begin to see the world in a new light. 
We recognize that everything is constantly evolving. 
Just as we change, so do those around us. 
Just as our thoughts and nature change with time, so do the people, and their thoughts also change with time.
This understanding softens and broadens our hearts, making us more tolerant of others' flaws and less quick to judge. 
We become more tolerant of the weaknesses and mistakes of others and do not form any hasty conclusions about them by forming wrong notions in our minds.
By embracing impermanence, we free ourselves from unnecessary suffering and open the door to inner peace. 
                             " Rajan Sachdeva "

प्रकृति के सिद्धांत - अनित्यता और परिवर्तन

अनित्यता अर्थात अस्थायित्व और परिवर्तन या बदलाव - प्रकृति के अपरिवर्तनीय अर्थात न बदलने वाले सिद्धांत हैं।

जब हमें अंततः यह समझ आ जाता है कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है, तो हम अधिक सहिष्णु, धैर्यवान और कम आलोचनात्मक हो जाते हैं।
संसार की हर वस्तु और परिस्थिति की क्षणभंगुर प्रकृति को पहचान कर उसे स्वीकार कर लेना हमें आक्रोश से बचाता है - अपनी एवं दूसरों की कमियों अथवा ख़ामियों को स्वीकार करने और जीवन को अधिक करुणा के साथ देखने में मदद करता है। 

जब हमें वास्तव में यह अहसास हो जाता है कि सुख और दुख, सफलता और विफलता, रिश्ते और परिस्थितियाँ सभी अस्थायी हैं, तो हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है।
हम संसार को एक नए दृष्टिकोण से देखने लगते हैं।
हमें यह समझ में आ जाता है कि हर इक चीज़ और हर एक परिस्थिति परिवर्तनशील है और सब कुछ निरंतर बदल रहा है। जैसे समय के साथ हम - हमारे विचार और स्वभाव बदलते रहते हैं, वैसे ही हमारे आस-पास के लोग और उनके विचार भी बदलते रहता हैं।

यह समझ अथवा ज्ञान हमारे हृदय को कोमल और विशाल बनाती है, और हम दूसरों की कमजोरियों और ग़लतियों को अधिक सहनशीलता से स्वीकार करने लगते हैं और अपने मन में उनके लिए कोई ग़लत अवधारणा कायम कर के जल्दी में कोई निर्णय नहीं लेते।

अस्थायित्व और नश्वरता के सिद्धांत को अपनाकर, हम स्वयं को अनावश्यक उद्वेग और पीड़ा से मुक्त कर के आंतरिक शांति का द्वार खोल सकते हैं।
                                                      " राजन सचदेव "

Sunday, March 30, 2025

वर्ष प्रतिपदा - अर्थ एवं परम्परा

प्रत्येक संस्कृति, धर्म और समुदाय का अपना एक कैलेंडर होता है जो वर्ष के किसी विशेष दिन से प्रारम्भ होता है।
हिंदू, जैन, ईसाई, मुस्लिम और बौद्ध, सभी के अपने अपने कैलेंडर हैं और अपना अपना ही नव वर्ष -  नए साल का दिन भी है।
हिंदू कैलेंडर अथवा पंचांग के अनुसार, नए साल की शुरुआत चैत्र शुक्ल के पहले दिन से होती है, जो चंद्र वर्ष का पहला महीना है।

भारत में दो सबसे लोकप्रिय भारतीय कैलेंडर हैं - विक्रमी संवत और शाका संवत।
विक्रमी संवत का प्रारम्भ  57 ईसा पूर्व यानी पश्चिमी कैलेंडर से 57 साल पहले - 
और शाका संवत की शुरुआत पश्चिमी कैलेंडर के 78 साल बाद मानी जाती है। 
वैसे ग्रेगोरियन कैलेंडर जिसे आमतौर पर पश्चिमी या ईसाई कैलेंडर के रुप में जाना जाता है - सबसे अधिक स्वीकृत अंतरराष्ट्रीय कैलेंडर है और इसका उपयोग पूरी दुनिया में किया जाता है।
पश्चिमी या ईसाई कैलेंडर के अधिक प्रचलित होने का एक कारण तो यह है कि एक समय में भारत सहित दुनिया के अधिकांश देश यूरोपीय और ईसाई शासकों के आधीन थे - और सभी शासित देशों और उपनिवेशों को ग्रेगोरियन कैलेंडर का ही उपयोग करना पड़ता था।
लेकिन सुविधा के लिए भारत और लगभग अन्य सभी देशों ने ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भी इसी कैलेंडर का उपयोग करना जारी रखा।

दूसरा - मीडिया और व्यापारियों द्वारा पहली जनवरी को नए साल के दिन के रुप प्रचलित करके विज्ञापन, कार्ड और सोवेनियर इत्यादि बेचकर - सम्मेलनों और  पार्टियों आदि का आयोजन करके इसका भारी व्यापारीकरण कर दिया गया है। 
किसी भी दिन, त्योहार, या उत्पादन को जनता तक पहुंचाने और लोकप्रिय बनाने में मीडिया और विज्ञापन का बहुत बड़ा हाथ होता है।
यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक जनवरी को ही नए साल की शुरुआत माना जाता है।
लेकिन फिर भी बहुत से भारतीय, चीनी, नेपाली और मिस्र के लोग - हिंदू, जैन, सिख और मुस्लिम समुदाय अपने पारंपरिक नए साल के दिन को नहीं भूले हैं। बहुत से लोग अभी भी इसे पारंपरिक रुप से मनाते हैं - चाहे वह छोटे या केवल एक पारिवारिक स्तर पर ही क्यों न हो।

पहली जनवरी  - पश्चिमी नए साल के दिन को खाने, पीने और पार्टियों में नाचने गाने  - और फैंसी उपहारों का आदान -प्रदान करके मनाया जाता है  
लेकिन वर्ष प्रतिपदा मनाने का पारंपरिक हिंदू तरीका इस से काफी अलग है।
परंपरागत रुप से इस अवसर पर नीम के पेड़ की कड़वी पत्तियों को मीठे गुड़ के साथ मिश्रित करके प्रसाद के रुप में वितरित किया जाता है। 
पहले इस नीम- गुड़ के मिश्रण को ईश्वर को नैवैद्य के रुप अर्पित किया जाता है। फिर इसे प्रसाद के रुप में परिवार, संबंधियों और मित्रों के बीच वितरित किया जाता है।
इस का एक गहरा प्रतीकात्मक अर्थ है।
यह प्राचीन हिंदू आध्यात्मिक ऋषियों एवं गुरुओं द्वारा सिखाए गए सर्वोच्च दार्शनिक दृष्टिकोणों में से एक है।
नीम - स्वाद में बेहद कड़वा और गुड़ - मीठा और स्वादिष्ट  
यह दोनों मानव जीवन के दो परस्पर विरोधी पहलुओं को इंगित करते हैं - दुःख और सुख - सफलता और विफलता -आनंद और पीड़ा के प्रतीक हैं। 
यह एक अनुस्मारक है कि जीवन हमेशा हर समय कड़वा या मीठा ही नहीं होता। यह दोनों का एक संयोजन है - मिश्रण है और इसलिए आने वाला नया साल भी सुख और दुःख का मिश्रण हो सकता है।
वैसे तो दोस्तों मित्रों और संबंधियों को "नया साल मुबारक" - नए वर्ष की बधाई एवं  शुभ कामनाएं देना एक सकारात्मक सोच और शुभ भावना का प्रतीक है लेकिन यह भारतीय परंपरा हमें जीवन के इस तथ्य की ओर भी इशारा करती है - जीवन की सत्यता और व्यवहारिकता की याद दिलाती है कि सुख और दुःख जीवन का एक अंग हैं। 

पहले इस कड़वे -मीठे मिश्रण को ईश्वर को अर्पित करना और फिर इसे प्रसाद के रुप में ग्रहण करने का अर्थ है भविष्य का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार करना - अर्थात भविष्य में जो कुछ भी हो उसे प्रसाद के रुप  में स्वीकार करके ग्रहण करना।
फिर संबंधियों और प्रियजनों के साथ इस 'कड़वे -मीठे मिश्रण' के उपहार का आदान -प्रदान करने का अर्थ है कि हमारे संबंधों में - रिश्तों में कभी कुछ मीठे और कड़वे क्षण भी आ सकते हैं - लेकिन उन्हें जीवन का एक अंग - जीवन का ही एक हिस्सा समझ कर उन्हें स्वीकार करते हुए प्रभु कृपा और पारस्परिक प्रेम और सदभावना से हल किया जा सकता है।

आमतौर पर हम पुरानी परंपराओं को  'आउट ऑफ डेट' - बेकार के वहम भरम या फ़िज़ूल बकवास कह कर उन की अवहेलना कर देते हैं, उन्हें नज़रअंदाज़ कर देते हैं और यहां तक कि कुछ लोग तो उनका मज़ाक़ भी उड़ाते हैं। 
लेकिन अगर हम धैर्य से उन्हें समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि इन परंपराओं के पीछे अक़्सर कुछ गहरे और सार्थक संदेश भी छुपे होते हैं। 
उनके पीछे के वास्तविक अर्थ और कारण को समझकर हम इन पुराने पारंपरिक त्योहारों को विशाल हृदय से और खुले एवं व्यापक विचारों के साथ मना सकते हैं।  
और केवल अपने ही नहीं - बल्कि अन्य सभी लोगों की संस्कृतियों और परंपराओं का भी आदर करते हुए - सम्मान के साथ उनकी सराहना करते हुए प्रेम और सदभावना से उनका साथ भी दे सकते हैं।
                 ईश्वर हम सभी पर कृपा करें - सभी विशाल हृदय बन सकें 
                                            "  राजन सचदेव "

Meaning of the Traditional way of Celebrating Pratipada - New Year

Every culture, religion, and community has its own calendar that starts on a different day of the year. 
Hindus, Sikhs, Jains, Christians, Muslims, and Buddhists all have their own calendars and different "New Year's Days".

According to the Hindu calendar, the New Year starts on the first day of Chaitra Shukla, the first month of the Hindu lunar year.
There are two most popular Indian calendars in India - Vikrami Samvat and Shaka Samvat.
The first day of Chaitra - 57 BC (57 years before the Western calendar) is considered the beginning of Vikrami Samvat - and Saka Samvat 78 years after the western calendar.
However, the Gregorian - commonly known as the Western or Christian calendar is the most acknowledged international calendar and is used all over the world.

One of the reasons why the Western or Christian calendar became more prevalent is that most of the world, including India, was once ruled and controlled by European and Christian rulers.
All ruled countries and colonies had to use the Gregorian calendar.
But for convenience, India and almost all countries continued to use this calendar even after gaining independence from British rule.
Secondly - January 1st as New Year's Day has been heavily commercialized by the media and merchants - by selling cards and souvenirs - by advertising and organizing meetings, parties, etc.
Media and advertising have a big hand in making any day, festival, or product popular and reaching the masses. 
That is why January 1st is considered the beginning of the new year internationally.
However, many people - Indians, Chinese, Nepalese, and Egyptians - Hindu, Jain, Sikh, and Muslim communities have not forgotten their traditional New Year's Day. Many people still celebrate it traditionally - though it may be small or only at a family level. 

Whereas the New Year’s Day of the Christian era (January 1st) is celebrated by eating, drinking, and dancing joyfully at parties and exchanging fancy gifts, the traditional Hindu way of celebrating New Year’s Day is quite different.

Traditionally, the tender but bitter leaves of the Neem tree mixed with sweet Jaggery * (Gurh) are distributed as Prasaadam (gift) on this occasion, which has a great symbolic meaning.
First, the Neem-Jaggery blend is offered to Ishwar (God) as Naivedya.
Then it is distributed among the family and friends as Prasaad (Gift).

This is one of the highest philosophical attitudes taught by the ancient Hindu spiritual masters.
The Neem, extremely bitter in taste, and Jaggery* sweet and delicious, signify the two conflicting aspects of human life —Joy and sorrow, success and failure, ecstasy and agony.

It is a reminder that life is not always ‘Bitter’ or ‘Sweet’ all the time. It is a combination of the two, and so might be the coming New Year - a mixture of joy and sorrow.

Although, Wishing "a happy new year" to all friends and families is a very positive thinking and a wishful gesture, however, this Indian tradition conveys more practical advice to loved ones - and a reminder to ourselves as well.

First offering this bitter-sweet blend to God and then accepting it as Prasaad, also has a symbolic meaning - of preparing ourselves to face, and, by the grace of God, accept whatever may happen in the future as 'Prasaad' (Blessings).

By exchanging the gift of this ‘bitter-sweet blend’ with friends and loved ones, we acknowledge that the relationships may also have some sweet and bitter moments - that by God’s grace can be accepted as part of life, and solved mutually.

Usually, We tend to disregard the old traditions as ‘out of date’ or even nonsense, but if we try to understand them, we will find that these traditions have deep and meaningful hidden messages. By understanding the real meaning and reason behind them, we can appreciate and celebrate the old traditional festivals with open and broad-mindedness - 
with love and respect for all people and their cultures and traditions. 
                                       May God bless us all.
                                           ' Rajan Sachdeva '

Note :
According to the Indian system, each day is considered from sunrise till the next morning sunrise.

 *jaggery or Gurh …..  Chunks of raw sugar - made from sugarcane.

Happy Pratipada - New year - Gudi Parva - Navreh

Happy Chaitra Shukla Pratipada to all of you - 
Happy New year Vikram Samvat, 2082

Hearty greetings and best wishes for Ugadi - Gudi Parva - Happy Navreh.
       Nav Sanvatsar ka avsar hai - Nav ho ye prakash
       Nav pallav ho - Nav jeevan ho - Nav ho ye vishvas

May the new year's sun dispel the darkness of confusion, fear, ignorance, narrow-mindedness, and discrimination from the minds of all.
May the Light of Gyana illuminate the entire world with auspicious and divine qualities like humility, equality, compassion, and broad-mindedness. 

        Sarve bhavantu sukhinah - Sarve santu Niraamaya 
        Sab ka mangal ho - Sab ka sab vidhi kalyaan ho 
May everyone be blessed - May no one suffers from any disease.
May all be blessed  - May all be prosperous in every way.

           Param Pita Parmaatma Sab teri Santaan 
          Bhalaa karo sab ka Prabhu - Sab ka ho kalyaan






























                   
                  Nav Reh =  Kashmiri New Year 

नव वर्ष, गुढी पडवा, नवरेह की हार्दिक शुभ कामनाएँ

आप सब को नव संवत्सर विक्रम संवत् 2082  चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 
नववर्ष - उगडी - गुड़ी पर्व  की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं  
                                नवरेह मुबारक़ 
गुड़ी पाडवा आणि हिंदू नव वर्ष विक्रम संवत २०८२ च्या हार्दिक शुभेच्छा

         नव संवत्सर का अवसर है  -  नव हो  ये प्रकाश 
         नव पल्लव हो -  नव जीवन हो - नव हो ये विश्वास

नव संवत्सर का ये सूर्य सकल संसार में भ्रम, भय, अल्पज्ञता - भेदभाव एवं तंगदिली के अन्धकार को दूर करे  - 
नम्रता, विशालता, समता, सम्पन्नता इत्यादि शुभ एवं दिव्य गुणों से युक्त ज्ञान का प्रकश करे। 
                  सर्वे भवन्तु सुखिनः - सर्वे सन्तु निरामया 
                  सब का मंगल हो  -  सब का सब विधि कल्याण हो 

          परम पिता परमात्मा सब तेरी संतान 
         भला करो सबका प्रभु - सब का हो कल्याण 













                       नवरेह  = नव वर्ष (काश्मीरी)

नव वर्ष, गुढी पडवा, नवरेह की हार्दिक शुभ कामनाएँ 

Tuesday, March 18, 2025

सुमिरन करले - बीती उमर हरिनाम बिना

सुमिरन करले मेरे मना 
तेरी बीती उमर हरिनाम बिना

अस्त्र तंत्र बिनु, रैन चंद्र बिनु, धरती मेघ बिना 
जैसे तरुवर फल बिन हीना - तैसे नर हरिनाम बिना

कूप नीर बिनु, धेनु छीर बिनु, मन्दिर दीप बिना 
जैसे पंडित वेद विहीना - तैसे नर हरिनाम बिना

देह नैन बिनु, जिह्वा बैन बिनु, पंछी पंख बिना 
जैसे पूत बाप विहीना - तैसे नर हरिनाम बिना  

काम क्रोध अरु लोभ मोह मद त्यागो संत जना 
कहत कबीर सुनो भई साधो इस जग में नहीं कोई अपना।
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अस्त्र     =    दूरगामी शस्त्र जैसे तीर, गोली, मिसाइल इत्यादि 
तंत्र         =   अस्त्र  फेंकने वाला यंत्र जैसी तीर के लिए कमान - गोली के लिए पिस्तौल या बंदूक इत्यादि 
     (जैसे कमान के बिना तीर और बन्दूक के बिना गोली बेकार है )
कूप          = कुआं 
नीर          = जल, पानी 
धेनु          = गाय 
छीर         = क्षीर - दूध 
मन्दिर      = घर, भवन 
वेद  = ज्ञान 

When the mind is clear

When the mind is clear, there are no questions. But ... When the mind is troubled, there are no answers.  When the mind is clear, questions ...