Friday, February 17, 2023

संतुलन

प्रकृति में हर चीज़ अपनी प्राकृतिक स्थिति और संतुलन को कायम रखने की कोशिश करती है।

पानी हमेशा अपना स्तर - अपना लैवल एक सा बनाए रखता है।
उबलता हुआ पानी भी धीरे-धीरे ठंडा हो कर अपनी प्राकृतिक स्थिति में आ जाता है।
यहां तक कि जंगल की बड़ी से बड़ी आग भी जलते जलते अंततः स्वयं ही शांत हो जाती है।
कम दबाव वाले क्षेत्रों को भरने और संतुलन बनाए रखने के लिए दूसरे क्षेत्रों से हवा बड़ी तेज़ी से तूफ़ान के रुप में उस ओर बढ़ने लगती है।
अशांत समुद्र भी कुछ देर के बाद शांत हो जाता है और बड़ी बड़ी भयानक लहरें भी धीरे धीरे शांति से बहने लगती हैं। 
सभी प्राकृतिक घटनाएं अपने आप को संतुलित करती रहती हैं।
कम या अधिक समय तो लग सकता है - लेकिन प्रकृति हमेशा अपना संतुलन बनाकर रखती है।
छोटी घटनाएं जल्दी संतुलित हो जाती हैं जबकि बड़ी और महत्वपूर्ण घटनाओं को अपनी मूल स्थिति में आने में कुछ दिन या महीने - साल या सदियाँ भी लग सकती हैं। लेकिन हर परिस्थिति और दशा हमेशा के लिए एक जैसी नहीं रह सकती।
परिस्थिति कितनी भी विकट क्यों न हो, अंततः वह बदल ही जाती है।
निर्माण, विनाश और पुनर्निर्माण प्रकृति की एक सतत प्रक्रिया है - और ये प्रक्रिया - ये चक्र हमेशा चलता रहता है। 

इसी प्रकार जीवन भी संतुलन और असंतुलन के बीच एक सतत प्रक्रिया है।
यह प्रक्रिया ही है जो जीवन को नदी की तरह गतिमान और प्रवाहित करती रहती है।
इस प्रक्रिया के बिना, जीवन स्थिर - सुप्त, और निष्क्रिय हो जाएगा।

प्रकृति और जीवन की इस प्रक्रिया को ज्ञानी एवं संत जन अच्छी तरह जानते और समझते हैं।
वे जानते हैं कि संसार की हर वस्तु और जीवन की हर घटना अस्थायी है। 
वे जानते हैं कि कोई भी परिस्थिति हमेशा के लिए एक सी नहीं रहती। 
इसलिए अप्रत्याशित घटनाओं और विषम परिस्थितियों में भी वे शांत रह सकते हैं।
वे जानते हैं कि वह परिस्थिति अंततः बदल ही जाएगी। 
इसलिए वे परेशान, उदास या क्रोधित नहीं होते।
अगर कुछ बदला जा सकता है तो वे अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार उसे बदलने की कोशिश करते हैं।
और अगर परिस्थिति उनके नियंत्रण से बाहर है, तो वो धैर्यपूर्वक उसके बदलने की प्रतीक्षा करेंगे और प्रकृति को अपना काम करने देंगे।
लेकिन हर परिस्थिति में वो अपने मन में एक संतुलन और सामंजस्य बनाए रखने की कोशिश करेंगे।
                                                                 " राजन सचदेव "

1 comment:

Old man and a Cafe

              He ordered the Cheapest Coffee Every Day and Sat for Three Hours  I run a small café on the corner of Maple and Third.  It’s n...