Monday, September 21, 2015

न जाने कहाँ ज़िन्दगी की शाम आएगी

क्या मौत​ कोई भेज के पैग़ाम, आएगी
न जाने कहाँ ज़िन्दगी की शाम आएगी

अक़्ल और दानाई का सौदा नहीं है इश्क़
​होश्यारी​ ​कोई ​​ ​यहाँ ​​​ ना काम आएगी

पहले 
​ख़लूसे इश्क़ ज़रा दिल में पैदा कर​ 

जुस्तजू-ए-हक़ तभी तो काम आएगी

आजिज़ी, हलीमी से मिलती हैं रहमतें
अक़्ल तो बस लौट के नाकाम आएगी

देखें अगर 
हम इसे नए अंदाज़ से
ज़िन्दगी ले के नया पैग़ाम आएगी

बोलता तो 
बहुत ​है पर करता कुछ नहीं
शायद ये तोहमत​ ​​भी मेरे​ ​नाम आएगी 

लड़ के ज़माने से भी 'राजन' 
मिलेगा क्या
आख़िर तो बस आजिज़ी ही काम आएगी

​                                     " राजन सचदेव "



​दानाई ​ Knowledge , wisdom
होश्यारी Cunningness, cleverness
​ख़लूसे-इश्क़ ​ Pure / selfless love
​जुस्तजू-ए-हक़​ Search for the Ultimate Truth
​आजिज़ी, हलीमी​ Humility
​नाकाम​ Without Success
​तोहमत​ Blame









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