Tuesday, June 30, 2015

कभी ये भी कर के देख My Recent Ghazal


ऐ दोस्त ज़िंदगी में कभी ये भी कर के देख 
दुश्मनों की झोली में भी फूल भर के देख 

मिलते नहीं हैं मोती ​किनारे पे बैठ कर  
पाना है ​​कुछ तो - समन्दर में उतर के देख 

राह में क़ुदरत के नज़ारे ठहर के देख 
रंग बदलते हुए शामो सहर के देख 

मौसमे ग़ुल में कभी कलियों को खिलते देख 
हुस्ने माहताब कभी, जलवे अबर के देख 

सीखे कोई इनसे तूफानों में सम्भलना 
दूब की हलीमी, हौसले शजर के देख

मायूस न हो इस क़दर काँटों को देख कर 
खिलते हुए ये फूल भी तो रहगुज़र के देख  

मंज़िल भी मिल जाएगी, तू बेसबर न हो 
दिल ज़रा अभी तोनज़ारे सफर के देख 

वक़्त से पहले तो कभी कुछ नहीं मिलता 
छोड़ दे शिकायतें और सबर कर के देख  

मेरी सोच भी तो वो, पहले सी अब नहीं 
लोग भी वैसे नहीं, अब इस शहर के, देख     

राज़े दिल खुलता नहीं चेहरे को देख कर 
क्या छुपा है पीछे ज़रा चश्मेतर के देख 

रखता है औरों के तो हर काम पर नज़र 
अपने दिल में भी तो कभी तू उतर के देख 

दूसरों की ग़लतियाँ  है देखना आसान 
ऐ दिले नादाँ  - हुनर हर बशर के देख 

दुनिया सुधारने की फिक्र यारा छोड़ दे 
दुनिया सुधर जाएगी, तू खुद सुधर के देख 

पहुंचना मंज़िल पे तब हो जाएगा आसां 
चल के ज़रा साथ किसी राहबर के देख 

       आयेगा नज़र ख़ुदा फिर अपने अंदर ही
       दिल का आइना ज़रा तू साफ़ कर के देख


      मदहोशी में मिलता है सकून किस क़दर
      ये ज़रा तू होश की हद से गुज़र के देख

      अच्छा था जहाने रंगो बू का ये सफ़र
      रास्ते 'राजन' तू अब अगले सफर के देख

                      By: Rajan Sachdeva
                   June 30, 2015

शामो सहर  dusk and dawn 
माहताब  moon
अबर   Clouds
दूब    Grass
हलीमी  Humility
हौसले  Courage
शजर  Trees
मायूस Sad, disheartened 
चश्मेतर   Wet eyes
जहाने रंगो बू  World of colors and fragrance (the physical world)




3 comments:

  1. वाह वाह बहुत ख़ूब

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  2. अति सुंदर

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